वो दिन
कहाँ से शुरू किये थे तुम जीवन अपना...
माँ के सूखे टिकलों, मटके का पानी,
व टूटी चारपाई से सजी झोपड़ी-भरी
सुविधाओं व सकून के अकेले मालिक ...
धीरे-धीरे करके जब तुम अपना मकान बनाते हो
तो भीतर से कितने-
पपोले-कच्चे व कमजोर हो जाते हो,
ईंट-ईंट करके इतना झुक जाते हो कि
अब सीधी कमर खड़े भी नहीं हो पाते हो।
सपनों के सौदागरों से
अपनी नींद का अधिकार खर्च कर
सोने के लिये गद्दे व तकिये लाते हो तो
कब इनका इस्तेमाल कर पाते हो और
तिज़ारत का कौनसा कायदा निभाते हो।
तुम जानते हो
जब यहाँ टी वी नहीं था
मगर तुम्हारे पास वक़्त व सकून तो था
अब समय बेचकर तुम यह ले भी आये हो तो
इसका क्या करोगे ?
तुम्हें मालूम नहीं कि तुम्हारी सुविधाओं व चैन के बीच का संतुलन
कहीं खो गया है,
सामान जुटाने की होड़ में तुमने सुविधायें नहीं, आराम नहीं
जरूरत से ज्यादा जो वस्तुएँ जुटा लीं हैं
जीवन के इस अंतिम दौर में तुम इनका क्या करोगे ?
पड़ोसियों से की गई ईर्ष्या व होड़ का भी नतीजा
अब तुम्हारे सामने अस्पताल के बैड के रूप में आया है।
क्या इसी तरह के सकून व आराम की तुम्हें तलाश थी
बड़ी-बड़ी खुशियाँ जुटाने के लिये छोटी खुशियों को तो कहीं
तुमने पीछे ही छोड़ दिया।
अब डॉक्टर न जाने
कितने तरीके के mysin (मेरे पाप) के
इंजेक्शन लगायेगा और
जीवन भर की गई गल्तियों और पापों
का प्रायश्चित करायेगा।
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