यूँ न उठो
पूजा से झटपट कि
जैसे साबुन से धोने थे हाथ
सो तुमने धो लिये
और हो गया बीती रात तक किये गये गुनाहों का प्रायश्चित।
रोज पूजा में आना
उसे आत्मा की शुद्धि का, मन की शान्ति का हिस्सा बनाना
तुम्हारी सिर्फ देन्दिनी ही नहीं तुम्हारी आत्मा की जरूरत है,
ऐसा जाने कि देह का आत्मा व आत्मा से ईश्वर का चाहे श्रण भर के लिये ही सही,
आँखों का मिलना या प्रेमालाप या सम्पर्क तुम्हारी पूर्णता के लिये
जरूरी है,
जिससे तुम्हारे देह कलश में स्फूर्ति का, ताजगी का,पवित्रता का उतर जाना महज रस्म नहीं,
तुम्हारी आने वाली और आ चुकी संतानों के लिये जरूरी है।
तुम्हें मालूम हो कि तुम्हारी आत्मा
अपनी असुन्तुश्त। में, खाली पन से इधर -उधर भटकती है
और भूखे होने से, रीता होने से ही
वह तरह -तरह की वासनाओं में रपटती है
अगर घर पर,
ईश्वर द्वार से ही इस देह और आत्मा कलश को भर कर चलो तो
भला भरे -पूरे पेट वह बाहर क्यों और क्या खायेगी और
यही तुम्हारी संतुष्ट आत्मा ही
तुम्हारी मुक्ति का मार्ग बन जायेगी।
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