Tuesday, June 23, 2015

ईश्वर की खोज



एक संतुलन,एक संगीत,
एक रिध्म, एक तारतम्य 
बहता रहता है इस समूचे ब्रमांड की शिराओं में 
जो अनेकानेक 
अव्यवस्थाओं को बड़ी खूबसूरती और कुशलता से संभालकर 
ऐसी व्यवस्था में ढालता है कि 
सैंकड़ों तारपुंजों के हजारों सूर्यों में,
पल-पल अरबों-खरबों होते परमाणु विस्फोटों में
चक्राती धरती के वजूद को एक-एक अक्षांश,
मौसम के मिजाज को एक-एक डिग्री भी,
इस कदर संभलता है कि 
उसपर जीवित एक-एक कीड़ी का भी जीवन पूरा चले 
ऐसी व्यवस्था निकालता है। 

यहाँ आकर 
असंख्य अगर-मगर, किन्तु-परन्तु भी 
सीधे आकार में लगकर तर्क बन जाते हैं,
और कितने ही अनजाने भय 
अपना आयाम खोकर गर्त में विलीन हो जाते हैं,
तो यह प्रकृति का ईश्वरीय रुप नहीं तो और क्या है ?

रोज हम इस सत्य को 
अपने अंतर्मन में उतारते हैं और 
पूछते भी जाते हैं कि
ईश्वर है कि नहीं ?  और  इसे  हम  कैसे  देख  सकते  हैं?    













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