तुम
किसी को भी पुकारो
बोलता तो वह एक ही है
जो इनके भीतर होता है चालक की अवस्था में
और तुम्हें कोई अपना सुनाई देता है।
तुम्हारे क्रोध का व गुर्राहट का भी कोई और नहीं
वह एक ही होता है शिकार
जो इन सब के बीच बसा हुआ है।
सच तो यह है कि तुम में भी
निराकार रूप लिये वही रहता है कोई तुम नहीं।
फिर किन उलझनों को हम सुलझाना चाह्ते हैं
और क्या हम और -और नहीं उलझ जाते हैं क्योंकि
आईने को जितना भी पोंछे हम,
स्वयं खड़े हैं तो हम ही तो नजर आते हैं।
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