एक मैं-मन,
एक मैं-आत्मा और
एक मैं-परमात्मा, तीनों ही
रहते हैं अपने-अपने भाव के साथ इस देह में
इसे संचालित करने को।
मैं-मन
तो इसे बाहर यहाँ-वहाँ खूब दौड़ाता है,
जहाँ-तहँआ टकराता है
और वासना की झाड़ियों घायल होने को बार-बार उलझाता है।
मैं-आत्मा, अच्छे-बुरे का ज्ञान रखता पुराना अनुभवी
मैं-मन को भीतर-भीतर सिखाता है,
उसे वस्तु-इस्थिति समझाता उसे
रोकता-टोकता कि -
रुको-देखो-सही-चुनो और चलो क़ह-क़ह कर
सही-गलत के द्व्न्द में उलझाता है।
और मैं-परमात्मा सिर्फ देखता भर है
कहता कुछ नहीं कभी
संकेत मात्र में घूरता,आँखें तरेर,कहता-सा
ऊपर आओगे तो बताऊंगा ?
इन तीनों में
फँसा-खिंचता-उलझा -उलझा मैं
डरता क्या करूँ ? क्या न करूँ ?
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