Monday, June 15, 2015

उलझन





एक मैं-मन,
एक मैं-आत्मा और 
एक मैं-परमात्मा, तीनों ही 
रहते हैं अपने-अपने भाव के साथ इस देह में 
इसे संचालित करने को

मैं-मन 
तो इसे बाहर यहाँ-वहाँ खूब दौड़ाता है,
जहाँ-तहँआ टकराता है 
और वासना की झाड़ियों घायल होने को बार-बार उलझाता है   

मैं-आत्मा, अच्छे-बुरे का ज्ञान रखता पुराना अनुभवी
मैं-मन को भीतर-भीतर सिखाता है,
उसे वस्तु-इस्थिति समझाता उसे 
रोकता-टोकता कि -
रुको-देखो-सही-चुनो और चलो क़ह-क़ह कर 
सही-गलत के द्व्न्द में उलझाता है।  

और मैं-परमात्मा सिर्फ देखता भर है 
कहता कुछ नहीं कभी 
संकेत मात्र में घूरता,आँखें तरेर,कहता-सा 
ऊपर आओगे तो बताऊंगा ?

इन तीनों में 
फँसा-खिंचता-उलझा -उलझा मैं 
डरता क्या करूँ ? क्या न करूँ ?       



















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