कोई भी शायद
मेरे नये-ताजे-नन्हें
सच के साथ नहीं आना चाहेगा
क्योंकि तब वह
सदियों से
अपने विशाल ओढे हुए
झूठ के फूटने-फटने का सदमा लेकर
वह कहाँ जायेगा ? कि
रावण को राम ने नहीं मारा-
रावण को तो सीता के तिरस्कार ने मारा।
और रावण को किसी ने नहीं जलाया -
वह तो उस दिन से
भीतर से जलने लगा
जिस दिन सीता ने
उसके पुरूषत्व की अवहेलना कर
राम को स्वीकारा......
सोचा है कभी
जब हमारा पुरूषत्व /अहम
दांव पर चढ़ा होता है
तब हमारे भीतर
क्रूर अटटहास करता, जलता हुआ
एक रावण क्या नहीं खड़ा होता है ?
जो हमारे बीच
वासना बन बसता है और
हर बार
बाहरी रावण को जलाने के
हमारे इस आडंबर पर
विभित्स हंसी हँसता है।
---------- सुरेन्द्र भसीन
मेरे नये-ताजे-नन्हें
सच के साथ नहीं आना चाहेगा
क्योंकि तब वह
सदियों से
अपने विशाल ओढे हुए
झूठ के फूटने-फटने का सदमा लेकर
वह कहाँ जायेगा ? कि
रावण को राम ने नहीं मारा-
रावण को तो सीता के तिरस्कार ने मारा।
और रावण को किसी ने नहीं जलाया -
वह तो उस दिन से
भीतर से जलने लगा
जिस दिन सीता ने
उसके पुरूषत्व की अवहेलना कर
राम को स्वीकारा......
सोचा है कभी
जब हमारा पुरूषत्व /अहम
दांव पर चढ़ा होता है
तब हमारे भीतर
क्रूर अटटहास करता, जलता हुआ
एक रावण क्या नहीं खड़ा होता है ?
जो हमारे बीच
वासना बन बसता है और
हर बार
बाहरी रावण को जलाने के
हमारे इस आडंबर पर
विभित्स हंसी हँसता है।
---------- सुरेन्द्र भसीन
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