कहने दो
अपनी इन सिसकियों को
तुम जो भी मुझसे कहना चाहती हो शब्दों में
होता यही है हरबार कि
वक़्त पर सही शब्द
तुम्हें मिल नहीं पाते,
तुम्हारी निर्मल भावनाओं को
मुझतक पहुंचा नहीं पाते
बस सूखे पेड़ों की तरह
ठूंठ के ठूंठ गूंगे-अपराधी बन
खड़े हो जाते हैं और मुझे कुछ समझा नहीं पाते हैं
और जो सारा कहा
तुम्हारे अहम से निकलकर
मेरे अभिमान के लौहद्वार से टकराता है
बेबस-लाचार और व्यर्थ हो जाता है
अब यह छुटी
आंसुओं की निर्मलधार ही शायद
हमारे बीच के वहम को धोएगी
और हमारे बीच
विश्वास का एक नया
बीज बोएगी !
------- सुरेन्द्र भसीन
अपनी इन सिसकियों को
तुम जो भी मुझसे कहना चाहती हो शब्दों में
होता यही है हरबार कि
वक़्त पर सही शब्द
तुम्हें मिल नहीं पाते,
तुम्हारी निर्मल भावनाओं को
मुझतक पहुंचा नहीं पाते
बस सूखे पेड़ों की तरह
ठूंठ के ठूंठ गूंगे-अपराधी बन
खड़े हो जाते हैं और मुझे कुछ समझा नहीं पाते हैं
और जो सारा कहा
तुम्हारे अहम से निकलकर
मेरे अभिमान के लौहद्वार से टकराता है
बेबस-लाचार और व्यर्थ हो जाता है
अब यह छुटी
आंसुओं की निर्मलधार ही शायद
हमारे बीच के वहम को धोएगी
और हमारे बीच
विश्वास का एक नया
बीज बोएगी !
------- सुरेन्द्र भसीन
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