Saturday, October 21, 2017

विश्वास

कहने  दो 
अपनी इन सिसकियों को 
तुम जो भी मुझसे कहना चाहती हो शब्दों में 
होता यही है हरबार कि 
वक़्त पर सही शब्द 
तुम्हें मिल नहीं पाते,
तुम्हारी निर्मल भावनाओं को 
मुझतक पहुंचा नहीं पाते 
बस सूखे पेड़ों की तरह 
ठूंठ  के  ठूंठ गूंगे-अपराधी बन 
खड़े हो जाते हैं और मुझे कुछ समझा  नहीं पाते हैं 
और जो सारा कहा 
तुम्हारे अहम से निकलकर
मेरे अभिमान के लौहद्वार से टकराता है 
बेबस-लाचार और व्यर्थ हो जाता है
 अब यह छुटी 
आंसुओं की निर्मलधार ही शायद 
हमारे बीच के वहम को धोएगी 
और हमारे बीच 
विश्वास का एक नया 
बीज बोएगी !
         -------      सुरेन्द्र भसीन 














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