अभी
हम कहाँ हैं?
जानने के लिए ही
अपने से वर्षों, सैकड़ों कौस
भटकते-भटकाते
झूठे-सच्चे सम्बन्धों के तानो-बानो से
उलझते-निकलते
उखड़ी जीवन राहों से गुज़रकर
बैरंग
लौट तो आए हैं हम
अपने ही भीतर।
मग़र पूरा जीवन
अपने से क्या चाहते थे
फिर भी....जरा भी
समझ नहीं पाए
हैं हम?
---- सुरेन्द्र भसीन
हम कहाँ हैं?
जानने के लिए ही
अपने से वर्षों, सैकड़ों कौस
भटकते-भटकाते
झूठे-सच्चे सम्बन्धों के तानो-बानो से
उलझते-निकलते
उखड़ी जीवन राहों से गुज़रकर
बैरंग
लौट तो आए हैं हम
अपने ही भीतर।
मग़र पूरा जीवन
अपने से क्या चाहते थे
फिर भी....जरा भी
समझ नहीं पाए
हैं हम?
---- सुरेन्द्र भसीन
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