Saturday, March 9, 2019

सर्पीले सवाल

कितने ही अनगिनत
हाँ..न..किंतु..परन्तु..अगर..मगर के विषैले
साँपों को हटाकर जब भी मैं
सत्यरूपी मणि को उठाता हूँ तो
उसे नकली पाकर
हरबार ठगा-सा रह जाता हूँ कि
जब प्रश्नरूपी साँप असली थे
तो उत्तररूपी मणि नकली क्यों?
क्यों यह इस जीवन में चल नहीं पाती है
मेरे किसी काम नहीं आती है?
हर तरफ प्रश्न हैं 
प्रश्न का सागर है गोता खाने को
ऊबचूब होकर, उनमें डूब के मर जाने को
मगर कोई किनारा नहीं न मिलता
उनसे पार उतर जाने को....
          ----     सुरेन्द्र भसीन




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