Friday, March 1, 2019

हम नहीं चाहते
मग़र वे तारें-बाड़ें पार कर-कर के
आते हैं इधर बारंबार...
हम नहीं चाहते
फिर भी वे मारे जाते हैं हमारे हाथों
उन परायों की आजादी की चिंता करते
जो कभी ग़ुलाम थे ही नहीं और
जिन्होंने एक बार भी उन्हें पुकारा ही नहीं...
मग़र वे चिंता नहीं करते  अपनी,
अपने वतन की
अपने करोड़ों भाईयों की
जो उनके गुनाहों की शर्मिंदगी ढोते हैं और
बेवजह गुनाहगार होते हैं...

 वे स्वार्थों पर सवार
हारे हुए जुआरी
जब-जब दांव लगाते हैं
अपनी हार-हार के सिवा कुछ नहीं पाते हैं...

अब कोई खैंचकर जबर्दस्ती उन्हें
इस नापाक दलदल से निकालेगा वरना
इंसानियत का दुश्मन टोला सब को
मुश्किल में डालेगा।
          ------       सुरेन्द्र भसीन

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