हमारी
इस देह से अधिक तो
हमारा दिमाग सोता है सदा...
शरीर तो उठता है हर दिन
मग़र हमें होश कहाँ होता है...
बेहोश पड़ा रह जाता है-
सब कुछ देखता,सुनता,करता, समझता भी...
जगता नहीं है जीवनभर
सोया-सोया-सा, खोया-खोया-सा...
यूँ शरीर तो आकर
चला जाता है इस संसार से कई कई बार
मग़र होश नहीं पाता जन्मों-जन्मों तक...
तभी तो
फिर-फिर आने को विवश
अपने को दोहराता
बार बार आता...
------ सुरेन्द्र भसीन
इस देह से अधिक तो
हमारा दिमाग सोता है सदा...
शरीर तो उठता है हर दिन
मग़र हमें होश कहाँ होता है...
बेहोश पड़ा रह जाता है-
सब कुछ देखता,सुनता,करता, समझता भी...
जगता नहीं है जीवनभर
सोया-सोया-सा, खोया-खोया-सा...
यूँ शरीर तो आकर
चला जाता है इस संसार से कई कई बार
मग़र होश नहीं पाता जन्मों-जन्मों तक...
तभी तो
फिर-फिर आने को विवश
अपने को दोहराता
बार बार आता...
------ सुरेन्द्र भसीन
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