उम्मीद व इंतजार -
दोनों में ही ख़ाली हाथ बहता है व्यक्ति
यथार्थ के बहाव में
कुछ पाने की आशा में, चाह में,
अपनी स्थितियों से उबर जाने को,
अनिश्चय के काले कुयें से बाहर निकल आने को।
मगर गुजरता, लगता समय व भाग्य
उसे कहता है रुकने को, ठिठकने को,
सय्यम में तनिक ठहर जाने को
व्यक्ति की गति को साध कर,
प्रकृति की गति में मिल जाने को
यक्सार हो जाने को।
दोनों में ही ख़ाली हाथ बहता है व्यक्ति
यथार्थ के बहाव में
कुछ पाने की आशा में, चाह में,
अपनी स्थितियों से उबर जाने को,
अनिश्चय के काले कुयें से बाहर निकल आने को।
मगर गुजरता, लगता समय व भाग्य
उसे कहता है रुकने को, ठिठकने को,
सय्यम में तनिक ठहर जाने को
व्यक्ति की गति को साध कर,
प्रकृति की गति में मिल जाने को
यक्सार हो जाने को।
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