Thursday, August 6, 2015

सुविधायें और संबंध

हाहाकार करते महासमुद्र से 
उफनती लहरों के बीच...... 
आग उगलते दावनलों के 
मुहानों से .... 
या फिर मृत्यु शय्या पर 
अंतिम सांस गिनते-गिनते 
जब सब कुछ रेत-सा छूटा जाता हो हाथों से 
तब भी व्यक्ति को उसके निभाये 
संबंध ही बचा कर लौटा लाते हैं। 
वही हैं, जो ईश्वर की मर्जी के आगे
उसके लिये प्रार्थना बनकर खड़े हो जाते हैं। 
और ये निभाये गये संबंध ही होते ही जिनके सदके
कुछ लोग वर्षों पूजे जाते हैं यहाँ से गुजर जाने के बाद। 
मगर सुविधायें? इनका भला क्या - 
ये सुविधायें ही संबंध बनाती हैं
और न चाहते हुये भी कभी 
संबंध ही सुविधा बन जाते हैं वक्त बदल जाने के बाद। 
ये सुविधायें और संबंध ही व्यक्ति को घेरे रह्तें हैं जीवन भर 
कभी ताकतवर व कभी कमजोर बनाते, 
और कभी उसे बदनामी-गुमनामी की गर्त में डुबाते,
कभी उसे नजरों में ऊँचा उठाते और कभी नीचा गिराते सम्बन्ध बिगड़ जाने के बाद। 





No comments:

Post a Comment