Sunday, July 12, 2015

वहशी, दरिंदा इंसान


 सबसे बड़ा और घिनौना
 वहशी, दरिंदा 
कोई और नहीं 
इंसान सिद्ध होता आया है 
सदियों-सदियों से इस धरा पर, वास्तव में। 
जो अपने पाप छुपाने के लिये 
मूक जानवरों को बदनाम करता है 
और कोई पेड़ उसके विरुद्ध गवाही न दे दे 
इसलिए उसे चीरकर सरेआम नीलाम करता है। 
अगर उसकी दरिंदगी के निशान चाहिये 
तो आओ और आकर देखो कि 
कुकुरमुत्ता की तरह फैलीं-पनपी अपनी वासनाओं की 
बेल को ढांपने व सजाने लिये
उसने अनगिनत पहाड़ों को कैसे-कैसे छेदा और बारूद से उड़ाया, कि 
पेड़ों को सुविधाओं के लिये निर्ममता से चीरा-काटा और जलाया, कि
बेकसूर जानवरों को खालों-दवाइयों के लिये तड़पाया व सताया,
और तो और
पानी के भीतर जाकर छोटी मछलियों को तो खाता ही है, 
हार्पून बरसाकर बड़े-बड़े जलचरों का जीना तक हराम कर दिया है।     

पर्यायवरण असंतुलन, बिगड़ता मौसम 
इस बात के पक्के गवाह हैं मगर 
इंसान सृष्टि के इन ईशारों को दरकिनार करता बेहया होकर   
उनको अनदेखा कर रहा है कि 
बादल पहले जैसे हँसते हुये नहीं,
सहमे-सहमे आते हैं, रोते -रोते बरसते हैं और
अपने दोस्त पेड़ों को न पाकर सिसकिंया भरते लौट जाते हैं,
सूर्य भी अब किसी गम में चमकता है और प्रकति की हालत देख 
उसका भी रोज़-रोज़ आने को अब मन नहीं करता है,
हवा भी अनिर्णय में भड़-भड़ा कर  झटके से चलती, तेवर दिखती , 
इंसान की बनाई चीजों से कुछ अधिक ही उलझती है। 
और धरती भी इन दिनों कुछ ज्यादा कंपकंपाती-हिलती और धड़कती है।

आज चाहे 
इंसान को प्रकृती के दुख भरे तेवर नहीं दिख रहे या 
अपनी जरूरतों- वासनाओं में अँधा होकर वह इन चिंताओं को कपड़ों पर पड़ी धूल की तरह झटक ले
मगर वह समझ ले जब भी देना होगा 
खून के बदले खून में उसे इसका हिसाब  देना होगा
तभी उसका कर्जा व प्रयाश्चित पूरा होगा।   




















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