Thursday, July 23, 2015

आत्मा की पतंग


तुनक-तुनका कर ही 
हवा में, ऊँचे आकाश में 
उड़ायी गई रंगीले कागज की पतंग,
चंगी(अच्छी) ही लगती है सदा,
हवा में लहराती छैल-छबीली,
सुनहरी लड़कियों-सी सर्र सर्र सिरों से गुजरती,
हमें बार-बार चौंकाती।
जो ऊपरी हवा में आते ही 
आत्मा-सी लहराती है,
और लहरा-लहरा कर तरंग में झूमती 
मानो नाचती हुई, गाती और 
जोश में आकर हवा में विचरते पक्षियों संग होड़ लगाती है 
इस बात से बेपरवाह कि 
उसकी डोर नीचे किसी एक के हाथ में है,
और साँस हवा में श्रण-श्रण कंपकंपाते अस्थिर ……। 
उसका लहराने का जीवन बस चंद श्रण का है,
हवा के रुकते या बदलते ही 
वह कितनी जल्दी गोता खायेगी,
वक़्त की गिरती बूंदों में भीग-गल 
वह न जाने कब धरती पर लेट-उतर 
पूरी हो जायेगी।  


















No comments:

Post a Comment