इस एक पेड़ के एक तने पर ही
दस्सियों टहनियां हैं
जिनसे किसी पर हजारों फूल खिलेंगे,
किसी पर हजारों फल आयेंगे,
किसी पर सिर्फ असंख्य पत्ते ही लहरायेंगे
और किसी भाग्यवान डाली पर ये सभी कुछ होता रहेगा बार-बार।
ये पेड़,उसकी टहनियां,फल,फूल या पत्ते तय नहीं करते
कि किस टहनी को खिलना है और कितना ....
और कोई रह जायेगी ठूंठ की ठूंठ, सूखी.... बाँझ जीवन भर
महज जलाने भर के काम आयेगी।
पेड़ पर आने वाले फल भी
नहीं समझते कि कितने बेकार झरेंगे धरती पर,
कितनों को पक्षी चोंच लगायेंगे,
कितने बदसूरत कहलायेंगे,
कितने रास्ते,रेहड़ियों,पेटियों में रगड़े खाते
सड़ जायेंगे मौसम व वक़्त की मार में,
कितनों को नकचढ़े बच्चे या लोग ठीक से खायेंगे भी या नहीं
या यूँ टोकरी या फ्रिज में पड़े पिलपिलायेंगे और
कितने मंदिर में पूजा का प्रसाद बनने का सौभाग्य पायेंगे।
ये सब कुछ तय होता है
प्रकृति के प्रांगण में बिना किसी वकालत पर।
ऐसे में, ऐसी अनगिनत संभावनाओं में अपना प्रारब्ध ढूंढ़ना -
सफलता-असफलता के सामाजिक पैमानों पर अपने
कर्मों को कसना--
उनपर हंसना,इतराना,रोना या पछताना
कहाँ की बुद्धिमानी है ?
क्योंकि यह तो प्रकृति का, ईश्वर का काम है
जो सदा चलता है हमारे कर्मों व संस्कारों के ईशारों पर
और खत्म होता है हमारे अंजामों पर।
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