किसी भी
कठोर व्यक्तित्व के ऊपर
अगर उलझा बेतरतीब समस्यांओं का झुरमुट है,
तो नीचे शक्ति का कठोर तल और
उसके नीचे, उसमें बहता किसी न किसी कोमल भाव का
मीठा-ठंडा कल-कल करता जल है।
यह द्रव्य-भाव ही है जो उसे सींचता-बचाता है,
या यूँ मानों उस जल भाव को बचाने के लिये ही,
ऊपरी आवरण उलझा-उलझा,
निर्दयी व कठोर होता चला जाता है।
फिर भी हवा तो जाती ही है उसमें हौले-हौले,
क्योंकि जहाँ जल है -संगिनी हवा है।
हमें हवा के साथ सोच बनकर
अडोल उसके जल-तत्व तक पहुँच जाना है
और यह नर,
जो नारीश्वर होने को था,
भला नारियल कैसे रह गया,
इसका पता लगाना है।
No comments:
Post a Comment