Wednesday, June 10, 2015

मेरा नाम



मेरा नाम 
एक ऐसा शब्द बीज है 
जो मुझमें रोपा गया 
मेरे इस धरती पर उतरने के बाद 
और अब जो मेरे अस्तित्व का हिस्सा बना 
चिपका दिया गया है मेरे पर - न छूटने के लिये । 

वह मेरे से भी कुछ अधिक  
फलता-फूलता है। 
और वहाँ-वहाँ भी मिलता है मुझे 
जहाँ मैं नहीं भी होता,होना चाहता,हो सकता। 

स्वार्थों की खोह में भी 
वह मुझसे अधिक अनाम है और 
दूसरे तरीके से बदनाम है।

मुझे मालूम है कि 
वह मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा 
 प्रेत बनकर टहलेगा कागजों में, मेरे गुजरने के  बाद
मगर वह मेरा नाम है, 
तो मैं तो 
उसके साथ हूँगा ही 
चाहूँ या न चाहूँ।





















उद्देश्य



आखिर क्या है ? क्यों है कि ?
मैं, तुम या वह 
हम सब इस आत्मा की मुक्ति ही चाहते हैं 
और इस देह व धरा को भोगने के बाद 
यहाँ पुनः पुनः नहीं आना चाहते हैं

ये तो विधि का विधान है कि 
देह धरे बिना कोई आत्मा हो या परमात्मा 
नभ से इस भूमि पर नहीं आ पाती है,
और मानो आती भी तो 
महाशून्य से शून्य की यात्रा में 
उसका प्रारब्ध क्या है?

रुके रहना - बिना पहचान के यत्र-तत्र लहराते रहना।
भला किस काम का?

एक जीवन, 
एक नाम तो उसे भी चाहिये 
इस धरती पर धन्य-धन्य हो  जाने  के  लिये।  










फलसफा



जीवन में वस्तु का और 
जीवन में जीवन का
अलग-अलग लोगों के लिये 
अलग -अलग महत्व व प्रभाव है। 
किसी के लिये दमड़ी ही लाखों हैं,
और किसी के लिये लाखों भी बेहिसाब हैं
जीवन में पूर्णता
गिनती व मात्रा से कभी पूरी नहीं आती क्योंकि   
श्रण भर में भी पूरा जीवन है और
कभी पूरे जीवन में अपने लिये श्रण भर का भी अभाव है। 

तो जीओ ऐसे कि 
यह श्रण अंतिम है इसी तथ्य से 
पूर्णता को पा लो। 
वरना रीते-रोते आये हो,
ऐसे ही जीवन बिताया है,
ऐसे ही मृत्यु को भी पा लो।    







Tuesday, June 9, 2015

मुक्ति की राह




यूँ न उठो 
पूजा से झटपट कि 
जैसे साबुन से धोने थे हाथ 
सो तुमने धो लिये 
और  हो गया बीती रात तक किये गये गुनाहों का प्रायश्चित। 
रोज पूजा में आना 
उसे आत्मा की शुद्धि का, मन की शान्ति का हिस्सा बनाना 
तुम्हारी सिर्फ देन्दिनी  ही नहीं तुम्हारी आत्मा की जरूरत है,
 ऐसा जाने कि देह का आत्मा  व आत्मा से ईश्वर का चाहे श्रण भर के लिये ही सही,
आँखों का मिलना या प्रेमालाप या सम्पर्क तुम्हारी पूर्णता के लिये 
जरूरी है,
जिससे  तुम्हारे देह कलश में स्फूर्ति का, ताजगी का,पवित्रता का उतर जाना महज रस्म नहीं,
तुम्हारी आने वाली और आ चुकी संतानों के लिये जरूरी है।
तुम्हें मालूम हो कि तुम्हारी आत्मा 
अपनी  असुन्तुश्त। में, खाली पन  से इधर -उधर भटकती है 
और भूखे होने से, रीता  होने  से ही  
वह तरह -तरह की वासनाओं में रपटती है
अगर घर पर,
ईश्वर द्वार से  ही इस देह और आत्मा कलश को भर कर चलो तो 
भला भरे -पूरे पेट वह बाहर क्यों और क्या खायेगी और 
यही तुम्हारी संतुष्ट आत्मा ही 
तुम्हारी मुक्ति का मार्ग बन जायेगी।     









संघर्ष



ना..ना 
यूँ मत बह-बिखर जाने दो 
अपने विचाओं को,अपनी उत्तेजनाओं को,
अपने सात्विक क्रोध को सड़कों पर 
किसी ट्रेफिक हवलदार के सामने,
कि शराब की दुकान पर याकि 
तेजाबी कुंठा बन किसी लड़की के गुलाबी चेहरे पर। 
माना कि सभी साधन सिमित ही हैं 
हमारी जरूरतों के हिसाब से 
मगर यह कुछ तो हमारी दिशाहीनता  व अकरंडता का 
ही नतीजा हैं और कुछ 
गली के आवारा कुत्ते व काले कौओं का भी कमाल है जोकि 
हमारा-तुम्हारा अधिकार हम तक पहुंचने से पहले 
बीच में ही उड़ा ले जाते हैं और 
हमारे हिस्से फूटे हुए ठीकरे ही आते हैं। 

अब तुम अपने विचारों को,
भावनाओं को कतरा-कतरा, तिनका-तिनका तक जोड़ो 
और  अपनी कर्मठता व सात्विक क्रोध को संयमित कर 
समय में साधनों का नया अध्याय जोड़ो। 





















जीने का तरीका



सुबह जल्दी जागो 
आओ प्रकृति के पास 
और देखो कि कैसे 
फूल  और पक्षी सुनाते हैं अपने राग 
सूर्य की किरणे भी कैसे शरीर को 
नन्हीं पोती की तरह गुदगुदाती हैं 
और तुम्हारे भीतर कई 
सफेद कलियाँ खिल -खिल जाती हैं। 

ठण्डी ताजी हवा भी 
तुम्हारे बदन को सुहाती है,
और तुम्हें स्फूर्ति से भर जाती है। 
तब तुम 
दिन भर फूल की तरह खिल -खिल जाते  हो 
स्वयं ही नहीं प्रफुलित रहते 
दूसरों को भी हँसाते हो 
इसी तरह दिन ही नहीं स्वर्ग -सा 
पूरा जीवन बिताते हो।   













तीन रंग



हमारी पूरी हाँ में भी 
एक छोटी लघु न है 
और पूरी बड़ी न में भी 
एक लघु हाँ है 
क्योंकि हम दूसरों के लिए 
स्थान रखते हैं 
अपने सोच के द्वार पूरे कभी भी 
बंद नहीं करते हैं। 



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हम अपनों को सदा मस्तिष्क से 
व  परायों को मन से मापने की 
गलती करते हैं
फिर चाहे इस गलती का दंड 
हम जीवन भर भरते हैं। 
मगर क्या करें 
हम तो ऐसे ही हैं 
तो  सदा ऐसा ही करते हैं। 


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चाहे 
कितनी भी आँखें चौडालो
यह आकाश पूरा का पूरा एक साथ नहीं आयेगा तुम्हारे पास 
चाहे 
कितनी भी बाहें फैलालो 
यह धरती भी नहीं आयेगी तुम्हारे हाथ 
इस दिखते से -लंबे, भरे पूरे जीवन  में 
सब कुछ अधूरा -अधूरा -सा ही पाओगे …… 

अच्छा है !
वरना तुम लौट के नहीं 
आ पाओगे।