मनुष्य की महिमा-ममता को, सिर्फ
मनुष्य ही बचा सकता है
जैसे ईश्वर को, धरती को
आकाश को, फूलों को......
फिर से उद्यम करो
कि फूल महकें
आकाश में सुर्यालोक
धरती पर मनुष्य के कंठ से
ईश्वर चहके.....
प्रातः भावनाओं की पत्तियों पर
सजीले ओस कण संवेदनाओं से
अनुभूतियों से
आदिम गंधों से बहकें......
.......
ईश्वर के नाम पर
अभी तो
शस्त्र संभाल रहे हैं लोग
तुम्हारे नाम से रचे शास्त्रों को
मध्य में रख कर.....
अध्यात्म बोल बोल रहे हैं
हिंसक आशाओं से घिरी छायाओं में
शब्द और अर्थ को पृथक-पृथक
हत्या कर। सत्य की सौगंध खा रहे हैं
वे सब
अब तुम्हारी ही ओर आ रहे हैं
प्रभु !
.......
रक्त सने
अपने ही रक्त-संबन्धों के रक्त से सने
आरक्त हाथों-वस्त्रों से
ये समझकर लोग /कितने नासमझ-पाप में लिप्त हैं
इन्हें श्रमा करो / मुक्त कर दो ऐ प्रभु
इस बार !.......
.......... baldev vanshi
मनुष्य ही बचा सकता है
जैसे ईश्वर को, धरती को
आकाश को, फूलों को......
फिर से उद्यम करो
कि फूल महकें
आकाश में सुर्यालोक
धरती पर मनुष्य के कंठ से
ईश्वर चहके.....
प्रातः भावनाओं की पत्तियों पर
सजीले ओस कण संवेदनाओं से
अनुभूतियों से
आदिम गंधों से बहकें......
.......
ईश्वर के नाम पर
अभी तो
शस्त्र संभाल रहे हैं लोग
तुम्हारे नाम से रचे शास्त्रों को
मध्य में रख कर.....
अध्यात्म बोल बोल रहे हैं
हिंसक आशाओं से घिरी छायाओं में
शब्द और अर्थ को पृथक-पृथक
हत्या कर। सत्य की सौगंध खा रहे हैं
वे सब
अब तुम्हारी ही ओर आ रहे हैं
प्रभु !
.......
रक्त सने
अपने ही रक्त-संबन्धों के रक्त से सने
आरक्त हाथों-वस्त्रों से
ये समझकर लोग /कितने नासमझ-पाप में लिप्त हैं
इन्हें श्रमा करो / मुक्त कर दो ऐ प्रभु
इस बार !.......
.......... baldev vanshi
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