Sunday, December 20, 2015

कुछ भी हो सकता है !

कुछ भी हो सकता है-
जब दहाड़ उठता है अचानक 
सदियों सोया भयभीत दुःसाहस 
तब अनुगूंजों में खिलखिला उठतीं हैं 
सूनी पड़ी भयावनी कंदराएँ.... 

कुछ भी हो सकता है-
जब नदियां अचकचा कर बदलती हैं अपनी दिशा 
तब मचल उठती हैं अंगड़ाइयां लेतीं 
धरातल में दबी 
कुचल केंचुआ संवेदनाएं..... 

कुछ भी हो सकता है-
जब चट्टानी शिखरों पर कूद 
उन्हें फांद जाती हैं जांबाज 
गूंजती रहतीं हैं सदियों तक 
भावों की उप्तकाएं..... 

 ऐसे में कुछ भी हो सकता है
कभी भी 
जब इठलाती जम्भाइयां लेती हुई जागती हैं 
सोची मानवी संभावनाएं !..... 
           ----------          baldev vanshi


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