Sunday, December 20, 2015

लाज

क्योंकि समय को लाज आती है 
समाज को भले न आये 
उघड़ता जा रहा समाज-व्यक्ति 
कपड़ों में ज्यादा पहन कर भी..... 

जररूत स ज्यादा खा कर 
व्यक्ति मरता है 
अधिक कपड़े पहन 
             उघडता है। 

आजकल की नहीं 
युगों पुराना सत्य है 
आज कौन देखता है 
असत्य ही लुभाता है 
राजा-प्रजा को समय ही बचाता है 
अपनी ओट में लेकर 
क्योंकि समय को ही 
लाज आती है जितनी 
उतनी दुनिया को 
मोहलत मिलती है जीने की 
अपने सभ्य वस्त्रों को 
आँख बचा सीने की 
देख समझ जीने की मौत को 
गले लगाने और आँखों -देख 
मक्खी निगलने की 
कोई नहीं करता अनदेखी.....

मौत भी नहीं आती बता कर 
जब भी घेरती है 
आंख बचा कर 
क्योंकि समय को लाज आती है ! 
                     ----------          baldev vanshi

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