चुप्पी
याद है तुम्हें
वह निराली सुरमई शाम
जब लिखा था तुमने
जब धूप
तीलियों-से अपने किनारे तोड़ रही थी
और तुम चुप्पी में भी बहुत कुछ बोल रही थी।
बांट रही थी अपनी चुप्पी
चुप रहकर भी
चुप रहकर भी
चुप्पी में ही चीखते हुए।
तब चुप्पी के इस भयंकर शोर में
मैं बहुत कुछ बोल गया था
अपना सब कुछ खोल गया था
चुप रहकर भी।
जिसको खोलकर मैं
खोल देखता रह गया था उसका
साहचर्य!
क्योंकि अपनी भावनाएं हीं
हैरान कर गईं थीं मुझको।
भटक गया था कुछ पल के लिए
अपनी खोल भावनाओं के जंगल में।
लेकिन तुमने
उसे मेरी नियति मानकर ही
अंगीकार कर लिया था साधिकार!
मौन बढ़ावा ही दिया था
उस दिन तुमने मुझको
और मैं
काफी समय तक
मात्र जंगल होकर रह गया था।
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बोलती चुप्पी
बोलती चुप्पी
याद है तुम्हें
वह निराली सुरमई शाम
जब लिखा था तुमने
मेरे दिल में अपना नाम !)
और मैं चुप
देखता भर रहा था तुम्हारी इन सुनहरी सपनीली आँखों में
और मैं चुप
देखता भर रहा था तुम्हारी इन सुनहरी सपनीली आँखों में
लेकिन तुम
लगातार लिखती ही गईं थीं
दिल की इबारत आँखों से
करती ही रही थीं
अपनी पहचान के घाव गहरे अपने भावों से।
उस दिन
करती ही रही थीं
अपनी पहचान के घाव गहरे अपने भावों से।
उस दिन
मेरी चुप्पी चीख रही थी
खोना चाहती थी
तुम्हारी आँखों से
तुम्हारी आँखों से
दिल की अतल गहराइयों में ।
और आज
जब तुम मेरे सामने हो
मैं गहरे घावों को सहलाता
बोलना चाहता हूँ अविराम।
लेकिन
लाख प्रयत्नों से भी बोल नहीं पाता हूँ।
खोल नहीं पाता हूँ
लाख प्रयत्नों से भी बोल नहीं पाता हूँ।
खोल नहीं पाता हूँ
टांके गहरे घावों के।
न जाने कैसे?
तुम उस दिन बोल गईं थी
सब कुछ
चुप रहकर भी...
लेकिन आज
लाचार, टूटा मैं
बोल नहीं पाता हूँ।
न जाने क्यों
मुख के जूठे शब्दों से
पवित्र कानों की दूरी पाट नहीं पाता हूँ!
बसमैं तो तुमसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि
लाख बोलना चाहकर भी
मैं कुछ बोल नहीं पाता हूँ।
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लेकिन
उस दिन
तुम दूर दूर तक
नजरों को दौड़ाकर भी
ढूंढ न पायी थी मुझको...
चीख चीख कर भी
कह न पायी थी कुछ भी
मुझको।
उस दिन भी मैं
तुम्हारे दिल के किसी कोने में पड़ा
दम तोड़ रहा था सिसकियों भरा।
आज जब
तुम मुझसे कितनी दूर हो
बहुत बहुत दूर...
लेकिन मैं तुम्हें
अपने कितने करीब पाता हूँ।
दिल की भाषा बोलकर भी
अपनी बात तुम तक पहुंचा पाता हूँ।
फ़र्क केवल इतना है कि
जब भी तुम टटोलती थी अपने मन को
बहुत परे पाती थी तुम मुझको।
जबकि मैं
तुम्हें ही अपना मानकर
दिल के साथ लगाता हूँ।
इसलिए ही
कुछ न बोलकर भी मैं
बहुत कुछ बोल जाता हूँ।
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यह कैसी चुप्पी
कुछ कहो
तुम्हारा कहना अच्छा लगता है
और चुप रहना भयावह!
माना कि जब बोलना व्यर्थ हो
तो चुप रहना ही बेहतर है।
लेकिन स्थितियाँ ऐसीं तो नहीं कि
तुम चुप रहो और
काम हो जाये...
जरा सोचो तो
भूखे की भूख
और सूरज की धूप
एक सी ही होती है।
फिर चाहे सूरज भूख हो या
भूखा हो सूरज
सब बराबर ही तो है...
कहीं तुम्हारा न बोलना
इन चीखों की वजह तो नहीं...
अरे!
तुम अब नहीं बोले
ह्रदय के पट तुमने नहीं खोले...
अब तुम्हारा प्यार
मात्र चुप्पी तो नहीं
जो मुझे सहला-सहला कर
मार डालना चाहती हो !
समय की धधकती आग में
गला डालना चाहती हो...
उफ !
काल तक काटे हैं मैंने
पर यह कैसी चुप्पी
क्षण तक भारी पड़ रहा है....
नदी के बहते
तुम प्यासे हो
आँच के रहते
तुममें जलन नहीं
चीख का कारण रहते भी
तुम्हारी जिव्हा में स्पंदन क्यों नहीं?
कहीं तुम गूँगे तो नहीं?
अंदर से बहता लावा तो नहीं हो तुम?
जो जमा नहीं
और तुम आज
सदा के लिए चुप्पी में
खो गयी हो,
सो गयी हो,
सदा-सदा के लिए।
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