चाहे एक
छोटा-सा ही सच लो
और उसे
और किसी से नहीं
पहले अपने से ही बोलो।
सिर्फ इतने से ही
तुम्हारी व्यथाओं के बड़े-बड़े पहाड़ दरकने लगते हैं।
सदियों से रुके
मकतूल डाले झूठ के जहाज
सच की हवा के हल्के झोंके से ही
सरकने लगते हैँ।
छोटा-सा ही सच लो
और उसे
और किसी से नहीं
पहले अपने से ही बोलो।
सिर्फ इतने से ही
तुम्हारी व्यथाओं के बड़े-बड़े पहाड़ दरकने लगते हैं।
सदियों से रुके
मकतूल डाले झूठ के जहाज
सच की हवा के हल्के झोंके से ही
सरकने लगते हैँ।
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