Thursday, May 14, 2015

एक सत्य यह भी



मृत्यु में प्राणी 
गहरी काली नींद के उस पार ही 
निकल जाता है अपने चेतन व अवचेतन को 
छोड़कर कभी न लौटने के लिये। 

काले स्याह पर्दे के पीछे याकि 
महाप्रकाश पुंज में समाता ही चला जाता है याकि 
कहीं चला जाता है इस देह को छोड़कर। 

वैसे वह हमारे बीच ही होता है 
एक नई पहचान लेकर 
फूल,पेड़,जानवर,इंसान या कुछ भी 
या जिसे हम चाहें भी या न चाहें 
मगर होता यहीं है वह लगातार 
हमारे भीतर बाहर 
हमारे वायदों को घूरता 
हमे देखता 
हमारी आंख्नो के सामने 
अपहचाना।              


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