Friday, May 29, 2015

पेड़ का दर्द



वेदनायें 
कैसे जमीं रहती हैं सालों -साल किसी की देह में 
देखना हो तो किसी पेड़ के चिरने से 
उसके भीतर बनी आवृत्तियों से जानों 
और अपने दर्द का बह जाना, शिराओं में गल जाना 
अपना सौभाग्य मानों। 

विंडबना है कि बात- बात में अपना पूर्वज मानकर 
उसकी कसमें खाने वाला इंसान भी 
कैसे पहले मौके में ही उसे चीरकर 
उसको अपनी सुविधा बनाता है , उसके दर्द को नहीं पालता 
तभी पेड़ का दर्द फैलाव पाकर भी पूरा नहीं होता और उसके 
आंसू तक धरती नहीं छू पाते
गोंदीले मोतियों से ढुलक कर शरीर से ही लटक जाते हैं 
बार -बार उसी की देह का श्रृंगार बन, 
जिसने अपने के चिरने  व कटने की चीत्कार 
सुनी हो बारम्बार। 

पेड़ का यही गम सालता है उसे 
तभी पेड़ जब तक ठूंठ बना खड़ा रहता है 
अपने असंख्य हाथ उठाकर करता है आतर्नाद ही  
हे ईश्वर! हे ईश्वर!













Thursday, May 28, 2015

मृगमरीचका



तवे से तप कर तुम्हारा फुल्का प्रेम 
ही उतरता है मेरे हाथों 
जो हमारे बीच रोज़ थालियों में बंटता है 
तुम्हारा स्नेह बनकर और 
हमारा अणु -अणु रक्त पोर जाता है 
अनूठी मिठास बनकर। 

हर बार
जब हम भीतर होते हैँ घर के 
तुम्हारी सुविधाओं के छाये तले 
तब तुम हमारे लिये कुछ और जुगाड़ने की बिसात में 
ग्राहकों की इचछाएँ पूरी कर रहे होते हो या 
बीच सड़क के बिगड़े ट्रक या बस को सधा रहे होते हो या 
चलते रेल के इंजन के साथ पटरियों पर उनींदे दौड़ रहे होते हो 
किसी और को गंतव्य तक पहुंचाने के लिये।   

तुम्हारे पास 
हमारी हर जरूरत का आभास 
उसके उभरने से पहले ही है 
तुम उन्हें 
अपने तजुर्बे व पूर्वानुमानों से भाँप लेते हो 
और हमारे कहते न कहते ही उन्हें अपनी 
छोटी -सी हां से ढांप लेते हो। 

सालों साल से 
अल सुबह आईने के समक्ष दाढ़ी रगड़कर तुम 
तैयार होकर काम पर निकल जाते हो और 
दिनों -दिन भीतर से सूखे-खोखले व पुराने हुए जाते हो जैसे कोई 
सोफ़ा सेवा देता -देता पुराना होता जाता है, ये अहसास 
हमें रोज़ नहीं होता मगर कभी,
कभी तो  होता  है उसमें कुछ कड़कने के बाद.... 

समझो इसी तरह 
घर को बनाते- बनाते 
इंसान खुद सदा के लिये बेघर हो जाता है। 
और अपनों की चाहत में 
उनसे ही बिछुड़ जाता है।     





















पहचान



मेरा कोई नाम नहीं है 
मैं नहीं रखना चाहता 
तुम्हारे मानसपटल पर 
अपनी कोई पहचान। 

मैं नहीं चाहता कि पहले से 
मुझे कोई पहचाने -पुकारे 
और मुझे मस्तिष्क के किसी 
कोष्ठक व खाँचे में धकेलकर 
पुरातन -अंदाजतेन करे मुझसे व्यवहार। 
मुझे 
स्त्री -पुरष -धर्म -देश -पशु -पक्षी  या पेड़ जैसे 
विभाजन भी नहीं हें स्वीकार। 
मै तो बस हूँ 
और रहूंगा 
यही है मेरा आकार।   





Wednesday, May 27, 2015

समन्वय



इतने कठोर,
इतने अहिशुन मत बनो 
तुम अपनी इस देह के प्रति 
अगर प्रभु के दर्शन इसने तुम्हें नहीं भी कराये तो क्या हुआ
देह धर्म का पालन तो मनोयोग से किया। 
याद करो कि ता उम्रह 
जीवन रस को , चाहतों को , वासनाओं को 
तुमने इसी देह से जीआ 
और अनगिनत भावनाओं के आवेग को 
तुमने इस लपलपाती देह से ही पीया।  
आज जब यह खोखली हो चुकी देह 
नये अनुभवों को पकड़ने में असमर्थ है 
तो तुम बेगानों के हाथों इसे 
धधका-धधका कर जला डालना चाहते हो। 
तुम  यह  क्यों नहीं समझते 
कि इससे भी कठोर सजा की हकदार 
तो तुम्हारी आत्मा ही है 
जिसने संस्कारों व आदर्शों का संग्रह न करके 
उसके उजालों से इस देह को महरूम रखा,
जिसने इस देह को इतना भटकाया और 
इन्द्रिओं के हाथों में बेहतहाशा घुमाया उस 
आत्मा के कुसुर का तुमने क्या ?
न  उसे तुमने तपाया न गलाया और 
न ही उसे देह धर्म की सीमाओं व आत्मा धर्म का पाठ ही पढ़ाया। 
बस, छोड़ दिया मुक्त - स्वछंद 
दूसरी नई देह में उतर जाने को, भ्रिमित करने  को। 
अच्छा हो 
इसे भी यहीं तपाओ 
और देह से इसका समन्वय कैसा हो 
इसका पाठ पढ़ाओ। 
















Tuesday, May 26, 2015

सीख



ऊँचे पहाड़ों से
यूँ ही नहीं पहुँचता पानी
झरने से होता हुआ नदिंयों तक।
वह अपने रास्ते की चट्टानों से टकराता
उन्हें रगड़ता -तोड़ता -मेटता ,
उनके  बारीक से बारीक छिद्रों का लाभ उठाता
और मजबूर करके उन्हें अपने संग घसीट लाता है
नदियों  व मैदानों में।
यह हमे यही तो सिखलाता है कि भले
जीवन की समस्याऐं बनी हों कितनी भी कठोर चट्टानों से
मगर उनको बहा कर
चलते जाना ही जीवन है।  

बचपन



ज़रा सोचो तो 
बच्चे भला कहाँ से आते हैं? 

बच्चे तो हमारे भीतर बचपन में ही होते हैं बीज रूप होकर 

जब हम बड़े होते हो जाते हैं 
तो हमारा बचपन भी 
बाहर निकल जाता है बड़ा होकर
इसलिये फिर कभी 
हम बच्चे नहीं हो पाते हैं 
चाहे हम बूढ़े हो जाते हैं 
बच्चे नहीं हो पाते हैं।  

Saturday, May 23, 2015



बच्चों के हाथों 
छूटी कागज की नाव बहती जाती नदी में … 
भला अपने अनुभवों को 
तट पर खड़े लोगों को 
वह कहाँ सुना पायेगी 
कि नदी कितनी गहरी है ?
कि नदी का पानी कितना ठंडा है ?

जब तक वह किनारे पहुँचेगी 
नदी के पानी में पसीजकर 
नदी का ही 
हिस्से बन जाएगी। 

अनाम पन्छी



मुझसे 
ये बार-बार क्यों पूछते हो कि मेरे भीतर
 क्या है? कौन है ?
जो मेरे भीतर 
समय-असमय आता है,
नाचता है,गाता है, कूकता है,
हँसता है,कवि बन कहता है और 
अनाम पन्छी बन उड़ जाता है। 
सच पूछो तो 
मैं भी इसे नहीं पहचानता,
न ही दे सकता हूँ इसे कोई नाम, कोई आकर। 

मैं तो 
दुआओं में, प्राथनाओं में ही रत हूं लगातार 
कि आओ 
मेरे में बसो 
और कैसे भी, जैसे भी 
इन फ़िज़ाओं में फहरजाओ। 










Friday, May 22, 2015

धरोहर




तुम्हारे 
जीवन भर के संचित अनुभव
व्यर्थ नहीं जाते कभी। 
देह छोड़ते ही 
तुम्हारी आत्मा उन्हें ले जाती है अपने साथ 
एक नये बीज का सत्व बनाने 
और रोपती है 
एक नई ताजी कोमल देह में। 

इसी तरह धरोहर  जो 
आगे जाती है संस्कार बनकर काम आती है। 
इसी तरह 
हाँ.. ना..., सही.. गल्त 
की जमीन पुख्ता होती जाती है।   

परिचय



अपनी 
इस लंबी उम्ह्र तक आते- आते 
तुम अपने बारे में क्या-क्या  जानते हो ?
उतना,
जितना कि समाज ने बताया ?
याकि उतना जितना घटनाओं से टकराकर तुमने पाया। 

अपने बारे में 
अपने से छिपते तुम 
स्वयं कब पूछोगे  
और अपने आपको सम्पूर्णता से कब  जानोगे ? 








Thursday, May 21, 2015

प्रकृति का पेड़



ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को 
उसके पॉँव मिल जायें 
वह नाचने लगे 
हमसे लिपटने लगे,गले लग जाये 
हमारे संग दौड़ कर दिखाने लगे,
अपनी ख़ुशी में शामिल करने को 
अपनी अनगिनत डालों या कंधों 
पर बैठा कर झुलाने लगे। 

ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को आवाज मिल जाये
और वह हमें हमारी तरह 
बोल -बोल कर दिखाने लगे ,
और भावनाओं में बहकर 
ऊँचे स्वर में कोई मीठा गीत गाने लगे। 

ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को पर मिल जायें 
वह एक जगह खड़ा न रहे 
उड़- उड़ कर अनजान प्रदेश जाने लगे 
और तरह- तरह के पहाड़ों -झरनों व नदियों को 
अपने उड़ान के खट्टे -मीठे तजुर्बे बताने लगे। 

मगर ऐसा होता नहीं है कभी 
प्रकृति का पेड़ 
चाहे कितना भी ललचाये 
जो प्रकृति ने उसे नहीं दिया 
वे पैर या पर 
वह पा नहीं सकता 
और प्रकृति के नियम को 
कोई भी झुठला नहीं सकता। 













सामाजिकता



सामाजिकता  के 
आवरण के नीचे 
बड़ी मजबूरियों से सभ्य हुये हम 
मूलतः तो एक पशु ही हैं। 
जो हर पल छटपटाता है और 
इस केंचुली के हटते ही 
बड़ा सुख व सकून पाता है।  

कभी सोचा 
कि ये जंगल ,ये पहाड़ ,ये झरने 
हमे इतना क्यों भाते हैं और 
कैसे -कैसे उनके गुप्त व मौन ईशारों को पाकर 
हम क्यों उनकी और खिंचे चले जाते हैं। 
और क्यों हमारे न चाहते हुए भी,
और  हमारे इन्हें गगनचुम्बी इमारतों के पीछे 
छुपाने के बावजूद भी 
ये  हर रोज हमारे भीतर उभर -घुमड़ आते हैं। 
सामाजिकता की नकली जहरीली सांस 
अपने फेफड़ों में भरते हम 
बार- बार ये क्योँ भूल जाते हैं कि 
बड़ी मजबूरियों से सभ्य हुये हम 
मूलतः तो पशु ही हैं।  








Wednesday, May 20, 2015

माँ की याद में



ओ मेरी माँ 
मुझे बचपने में ही 
इस भीड़ भरे शहर में 
अकेले बेसहारा क्यों छोड़ गई थी ,
जैसे कोई शेरनी छोड़ देती है
शावक को घनघोर बियाबान जंगल में। 
एक लम्बे समय तक, 
इन सड़कों की जगमगाती नियोन लाइटों की शहतीरें 
और दानव की तरह इधर- उधर भागती गाड्यिों की 
रोशनियों की आंख्नो में चुभते किरचें 
दोनों ही मुझे बहुत सताती रहीं 
और  इस भरे पूरे शहर में भी 
मुझे अकेला होने का अहसास कराती रहीं। 
तब मेरा विश्वास भी निरा मेरा वहम निकला कि 
वक़्त व ऊम्र के बीतते - गुजरते मै इस भय से 
अवशय छुटकारा पा लूंगा। 
मगर यह  हो न सका कयोंकि ये तो मेरे जिस्म की चमड़ी से चस्पां हो  चुकी है। 
और अब तो उम्ह्र के इस पड़ाव में कोई शक नहीं रहा अशेष कि मुझे तो इनके साथ ही जीते जाना होगा। 
मगर मैं अपने बच्चोँ को 
उनकी माँ के आंचल में पालकर 
उनको इस दर्दीले अहसास से बचाना चाहते हूँ 
और उनका परिचय (पालन )
एक निर्भय उजले सूर्य  से करवाना चाहता हूँ। 















खरी- खरी




अपने
मरते ही
तुम एक पेड़ अपने  साथ जलाते हो
भला जन्मते ही क्या तुम एक पेड़
अपने साथ लाते हो या
इस धरती पर पॉँव रखते ही उसे उगाते हो !

भाई , ऐसा ही चलता रहा
तो ये पेड़ हमारे कितने दिन चल पायेँगे
मरने पर तो छोड़ो
जिंदा रहते भी तुम्हें  ये
सांस के लिये हवा नहीं दे पायेँगे।

मेरी मानो
पेड़ों के कम होने की हालत पर
ज़रा दृष्टि डालो
और मरने और पैदा होने के
रिवाजों में पेड़ उगाने की रिवायत डालो।              



महशून्य



कल 
में से निकलता है आज 
आज में से निकलेगा  - कल । 
यूँ हीं 
उतरती प्याज़ की परतें 
                उतरती परतें ... 
और फिर एक दिन बचता है 
           शून्य .. महशून्य …  ।    

Thursday, May 14, 2015

एक सत्य यह भी



मृत्यु में प्राणी 
गहरी काली नींद के उस पार ही 
निकल जाता है अपने चेतन व अवचेतन को 
छोड़कर कभी न लौटने के लिये। 

काले स्याह पर्दे के पीछे याकि 
महाप्रकाश पुंज में समाता ही चला जाता है याकि 
कहीं चला जाता है इस देह को छोड़कर। 

वैसे वह हमारे बीच ही होता है 
एक नई पहचान लेकर 
फूल,पेड़,जानवर,इंसान या कुछ भी 
या जिसे हम चाहें भी या न चाहें 
मगर होता यहीं है वह लगातार 
हमारे भीतर बाहर 
हमारे वायदों को घूरता 
हमे देखता 
हमारी आंख्नो के सामने 
अपहचाना।              


नींद एक जीवन/ मृत्यु



नींद 
भी  तो 
एक तरह से मृत्यु का ही एक  लघु रूप होता है। 
जो  हमें निचेश्ट कर प्रारूपित करता है कुछ पलों के लिए 
नीचे - गहरे नींद की आगोश में 
और हम 
एक नया लोक आलोक कर लेते  हैँ 
अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए। 
तब हम यहाँ के संस्मरणों के स्मरण के इलावा 
सब कुछ खो चुके होते हैं। 

और 
नींद पूरी होने पर 
बिस्तरयान पर पड़े हमे यह अहसास 
भी नहीं होता कि हम एक 
छोटी मृत्यु को जी भी चुके हैं।                     




Monday, May 11, 2015

नींद एक जीवन/ मृत्यु



नींद 
भी  तो 
एक तरह से मृत्यु का ही एक  लघु रूप होता है। 
जो  हमें निचेश्ट कर प्रारूपित करता है कुछ पलों के लिए 
नीचे - गहरे नींद की आगोश में 
और हम 
एक नया लोक आलोक कर लेते  हैँ 
अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए। 
तब हम यहाँ के संस्मरणों के स्मरण के इलावा 
सब कुछ खो चुके होते हैं। 

और 
नींद पूरी होने पर 
बिस्तरयान पर पड़े हमे यह अहसास 
भी नहीं होता कि हम एक 
छोटी मृत्यु को जी भी चुके हैं।                        

नींद एक - सफर

छूट जाती है
यह देह हमारी यहाँ 
इस बिस्तर पर और होश हमारा 
निकल जाता है 
हमारी अद्श्य देह लेकर 
अपने ही रचे 
एक श्रुण भंगुर  संसार में। 

तोड़ता - जोड़ता , बनता -बिगाड़ता 
अतृप्त से तृप्त होने को। 

पुनः होश फिर आ जुड़ता है इस देह  में 
तृप्त  से अतृप्त होने को 
नींद पूरी होने पर।             

Saturday, May 9, 2015

एक के नहीं 
अनेक के 
ढोल पर थाप देने से ही 
गिरती है पुरानी व्यवस्था की दीवार ,
मगर पुराने नींव -नक़्शों पर 
नयी सोच नहीं चढ़ेगी परवान। 

इस पुराने दुर्ग की दीवारों व छतों  को 
नये प्लस्तर व रंग लेपने - पोतने  भर से 
बदल नहीं जाने वाला इस व्यवस्था का व्यवहार। 

नया कुछ चाहिए तो इसे 
नींव से ही बदलना होगा 
अपनी सदियों पुरानी 
सोच  को बदलना होगा।