Wednesday, September 19, 2018

पाती

पाती

सब कुछ तो
कह नहीं दिया है मैंने
काफी कुछ
मिलने पर ही कह पाऊँगा...
तुम्हारे हाँ.. न..के स्वर-अनुस्वर और
आते-जाते चेहरे के भावों से
अपनी बातों का प्रभाव
अगर मैं समझ पाऊँगा तो
बाकी हाल-चाल भी बतिया पाऊंगा...
वक्त निकालकर मिलने आ जाओ
फोन पर ही सब दुख-सुख न समझा पाऊंगा...
अपने गाँव को कैसा शहरी रोग लगा है यह
थोड़े में कैसे समझाऊँगा?
अब बाकी जो कुछ बचा है मन में
सामने ही कह पाऊँगा...
उम्र भी नहीं बचा है कुछ ज्यादा
सुन लो!
वरना मैं यह बोझ अपने
साथ ही लेता जाऊँगा...
                  चला जाऊँगा।
        ---------     सुरेन्द्र भसीन

Thursday, August 23, 2018

नींद

पहले जबरदस्त
और अब जबरदस्ती ही आती है नींद,
घण्टों बिस्तर पर पड़े रहो
शुरू होती ही नहीं है
नींद की मशीन।
लोग कहते हैं यह
खराब हो गई है मगर
मैं इसमें दिन भर की थकान मिलाऊँ तो
यह काम करने लग जाती है।
फिर बिस्तर पर पड़ते ही
झट नींद आ जाती है।
       ------  सुरेन्द्र भसीन

ज़िब्ह

पड़ोसी के
घर बंधे बकरे को नहीं
पर मुझे तो
यह मालूम है कि
कल बकरीद है, इसलिए
बकरे की मैं... मैं पर
मैं बड़ा छटपटाता हूँ
और उसके
कल एक बार जिबह होने से पहले
खुद आज
कई-कई बार
क़त्ल हुआ जाता हूँ...
       ----- सुरेन्द्र भसीन             

Wednesday, August 1, 2018

हिसाब

हिसाब

दो रोटी सुबह
दो दोपहर और
दो रोटी रात
प्याज के साथ खाकर ही
गरीब-मजदूर का जीवन चल जाता है।
मगर संसार का हर पूंजीपति
इसी हिसाब में मरा जाता है कि
गरीब इतनी रोटी भी
क्यों और कैसे खाता है?
       -----    सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, June 19, 2018

वक़्त का बहाव

वक़्त की नदी में
बहुत बहाव है...
बहुत ज्यादा रवानी और पानी है...
पकड़े रहो, जकड़े रहो
एक दूसरे को लगातार
पूरी मजबूती से, शिद्दत से...
बह गए तो
याद चाहे कितना भी आएं
मिल न पाएँगे फिर कभी
बहते ही चले जाएंगे...
न जाने कहाँ रुकेंगे...?
रुकेंगे भी या नहीं कहीं कि
पानी में ही, वक़्त में ही
गल घुल जाएंगे
सदा सदा के लिए...
पकड़े रहो,
जकड़े रहो
एक दूसरे को
वक़्त की नदी में
गलने घुलने से पहले...
वक़्त की नदी में
बहुत बहुत बहाव है...।
     ------     सुरेन्द्र भसीन


Monday, June 18, 2018

मन

जब भी जब भी
मैं तुम्हारी-हाँ या न
आँखों से पढ़ना चाहता हूँ तो
कुछ उल्टा ही पढ़ समझ जाता हूँ।
जब भी मैं
नहाने की लिए तुम्हारी
आँखों से अथाह शीतल जल के झरने चाहता हूँ तो
न जाने क्यों
सूखे,
 रेगिस्तान में
पहुँच संशय के अंधडों में
अपने को घिरा पाता हूँ।
और यूँ ही जब भी
मैं लम्बे हरे भरे बाग में
तुम्हारे संग विचरना चाहता हूँ तो
स्वयं को
खारे पानी के समुद्र में
घिनौने प्रश्नों के जलीय जीवों से
अपने को घिरा पाता हूँ।
मैं तुम्हारी आँखों के
सही व गलत के कुतर्कों में
फँसना नहीं चाहता हूँ।
बस तुम्हारी आँखों से,
 तुम्हारे मौन से,
तुम्हारे मन में उतरना चाहता हूँ।
          ------    सुरेन्द्र भसीन

Saturday, June 16, 2018

खुशनसीब?लोग

खुशनसीब?लोग

खुश
नहीं हैं लोग कहीं से भी
मगर खुश होना चाहते हैं
रोज हंसने के नये नये बहाने ढूँढे जाते हैं
कि आज मेरा जन्मदिन है
कि शादी की सालगिरह है
कि दिवाली है
कि ईद या दशहरा है
और न जाने क्या क्या?
जैसे कि अपने को चराते, बहलाते हैं
कि आगे के आगे धकेले जाते हैं...?
जीवन जी नहीं रहे
बस गुजारते जाते हैं...
यूँ कि आधे मरे हुए लोग
मगर पूरा जीवन जीना चाहते हैं...
हंसने के बहाने
ढूँढने में जीवन बिताते हैं।
        -----      सुरेन्द भसीन