Saturday, June 16, 2018

खुशनसीब?लोग

खुशनसीब?लोग

खुश
नहीं हैं लोग कहीं से भी
मगर खुश होना चाहते हैं
रोज हंसने के नये नये बहाने ढूँढे जाते हैं
कि आज मेरा जन्मदिन है
कि शादी की सालगिरह है
कि दिवाली है
कि ईद या दशहरा है
और न जाने क्या क्या?
जैसे कि अपने को चराते, बहलाते हैं
कि आगे के आगे धकेले जाते हैं...?
जीवन जी नहीं रहे
बस गुजारते जाते हैं...
यूँ कि आधे मरे हुए लोग
मगर पूरा जीवन जीना चाहते हैं...
हंसने के बहाने
ढूँढने में जीवन बिताते हैं।
        -----      सुरेन्द भसीन

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