Saturday, July 18, 2015

व्यवसायिक तनाव (??


जब तब 
अपने भीतर के बिखराव को बाहर क्यों निकालते हो 
और अपनी खिसियाहट व गुस्सा 
कमजोर,मासूम,निरपराध बच्चों और बीवी पर क्यों उतारते हो। 
तुम्हें ये सौगात ईश्वर ने 
पालने व संभालने के लिये दी है,
ये वे फूल और सुगंध है जो तुम्हें 
तुम्हारे पुण्यों से प्राप्त हुये हैं और इस 
नेमत को तुम्हें ईश्वर की धरोहर मानना है,
अपना बाज़ारू गुस्सा जब-तब इन पर नहीं उतारना है। 

सोचो विवशता उनकी जिनके पास 
ये सौगातें नहीं हैं - वफादार बीवी या बच्चे नहीं हैं। 
वे इन्हें पाने के लिये किस कदर ललकते हैं और 
किस-किस मंदिर की चौखट पर माथा नहीं रगड़ते हैं,
मन्नते मांगते,सजदा करते हैं। 
इतिहास गवाह है कि अधिकांश युद्ध तो 
इस्त्री की प्राप्ति, संतान की सलामती के लिये ही हुये हैं। 
ऐसे में अपनी असफलता को उनपर उतारना,
या अपनी दुश्वारियाँ उनपर लादना,
अपनी जिम्मेवारियों से भागना नहीं तो और क्या है?

तुम ये क्यों नहीं समझते 
कि आगे जीवन में यही तुम्हारे काम आयेंगे।  















Friday, July 17, 2015

हमारे श्वास



तुम्हारे जीवन पर्यन्त 
और अशेष होने पर भी 
तुम्हारी देह के अवशिष्टों व अवशेषों को 
अनेक प्रकार से निस्तारित करता 
तुम्हारा यह पूर्वज-देवता-स्वरूप वृक्ष 
अवश्य ही
तुम्हारी आत्मा को भी अपने भीतर संभालता है 
सृष्टि से नये जीव के अह्ह्वान आने तक। 

हमारी कामनायें हीं 
धरती हैं जब कोई नवजात देह 
तो वह ही वृक्ष से निकलकर - श्वास बनकर,प्राण बनकर 
उसमें समाता है आत्मास्वरूप सजने को। 

उससे पूर्व वह समाहित है सदा वृक्षों में 
हमारे पूर्वजों के रूप में/हमारी कामना की इंतजार में 
पुनः-पुनः लौट-लौट कर आने को 
हमारे बालकों की सांस बन जाने को।  



हमारे कर्म / हमारे अंजाम



इस एक पेड़ के एक तने पर ही 
दस्सियों टहनियां हैं 
जिनसे किसी पर हजारों फूल खिलेंगे,
किसी पर हजारों फल आयेंगे,
किसी पर सिर्फ असंख्य पत्ते ही लहरायेंगे 
और किसी भाग्यवान डाली पर ये सभी कुछ होता रहेगा बार-बार

ये पेड़,उसकी टहनियां,फल,फूल या पत्ते तय नहीं करते 
कि किस टहनी को खिलना है और कितना .... 
और कोई रह जायेगी ठूंठ की ठूंठ, सूखी.... बाँझ जीवन भर 
महज जलाने भर के काम आयेगी।

पेड़ पर आने वाले फल भी 
नहीं समझते कि कितने बेकार झरेंगे धरती पर,
कितनों को पक्षी चोंच लगायेंगे,
कितने बदसूरत कहलायेंगे,
कितने रास्ते,रेहड़ियों,पेटियों में रगड़े खाते 
सड़ जायेंगे मौसम व वक़्त की मार में,
कितनों को नकचढ़े बच्चे या लोग ठीक से खायेंगे भी या नहीं 
या यूँ टोकरी या फ्रिज में पड़े पिलपिलायेंगे और 
कितने मंदिर में पूजा का प्रसाद बनने का सौभाग्य पायेंगे। 

ये सब कुछ तय होता है 
प्रकृति के प्रांगण में बिना किसी वकालत पर। 

ऐसे में, ऐसी अनगिनत संभावनाओं में अपना प्रारब्ध ढूंढ़ना -
सफलता-असफलता के सामाजिक पैमानों पर अपने 
कर्मों को कसना--
उनपर हंसना,इतराना,रोना या पछताना 
कहाँ की बुद्धिमानी है ?
क्योंकि यह तो प्रकृति का, ईश्वर का काम है
जो सदा चलता है हमारे कर्मों व संस्कारों के ईशारों पर 
और खत्म होता है हमारे अंजामों पर। 














Wednesday, July 15, 2015

खिड़की एक आशा


कमरे की 
बंद खिड़की खोलते ही 
भाग कर अंदर आती है -
हवा,रोशनी,आकाश,पेड़,आवाजें,फूलों की सुगंध,
नये दृश्य व नयी सोच और भी न जाने क्या-क्या?

सीलन भरी, घुटन भरी इस जिंदगी में ताजी हवा लाती है-
पुलक, उत्साह,आशायें, उम्मीदें, सपने,
कुछ पराये, कुछ अपने।
मगर बहुत कुछ 
बीता हुआ तुम्हारे भी चलने,बिसारने से बीतेगा जल्दी से 
वरना लिपटा रहेगा तुम्हारे वजूद से पुराने-काले कबंल-सा या 
जंग खायी लोहे की बेड़ियों से  लिपटा रहेगा तुम्हारा तन-मन 
निकल/छूट नहीं पायेगा काल के भूत से,
जो मथता-कोंचता खींचेगा तुम्हें दुर्दिन की यादों में,
बीती कंदराओं में, भयावह सपनों में
निकलो इससे, हिलो, उठो, खोलो,
अपने ह्रदय की बंद पड़ी खिड़कियों को 
और स्वागत करो, आने दो नये को भीतर 
खिड़की से मन में 
उल्लास को, उजास को।  














Tuesday, July 14, 2015

बच्चे जब बड़े हो जाते हैं


यह सच है 
बच्चे जब 
कंधों तक बड़े हो जाते हैं 
हम फलों-फूलों के भार से झुक-झुक जाते, 
उन्हीं के दुख हम दुखते, 
उन्हीं की खुशियाँ खुश्तें हैं,
वे ही हमारे लिये सब कुछ हो जाते, रब हो जाते हैं। 
मगर क्या बच्चे भी हमें 
इतना ही चाहते हैं, हमारे इतने ही काम आते हैं?
नहीं !
पता नहीं ऐसा क्यों नहीं हो पाता।
बच्चे अपने बच्चोँ पर वारी जाते हैं, 
अधिक प्यार-स्नेह दे पाते हैं, 
अपने माँ-बाप से सगापन नहीं निभा पाते जिनका वे खाते हैं। 
प्रेम की, बलिदान की भी 
कैसी अनूठी-स्वार्थी अजीबोगरीब नींव व परंपरायें हैं -
हर बार इस वाक्या में 
माँ-बाप तो सूने के सूने ही रह जाते हैं,
अकेले पड़ जाते हैं। 

Sunday, July 12, 2015

वहशी, दरिंदा इंसान


 सबसे बड़ा और घिनौना
 वहशी, दरिंदा 
कोई और नहीं 
इंसान सिद्ध होता आया है 
सदियों-सदियों से इस धरा पर, वास्तव में। 
जो अपने पाप छुपाने के लिये 
मूक जानवरों को बदनाम करता है 
और कोई पेड़ उसके विरुद्ध गवाही न दे दे 
इसलिए उसे चीरकर सरेआम नीलाम करता है। 
अगर उसकी दरिंदगी के निशान चाहिये 
तो आओ और आकर देखो कि 
कुकुरमुत्ता की तरह फैलीं-पनपी अपनी वासनाओं की 
बेल को ढांपने व सजाने लिये
उसने अनगिनत पहाड़ों को कैसे-कैसे छेदा और बारूद से उड़ाया, कि 
पेड़ों को सुविधाओं के लिये निर्ममता से चीरा-काटा और जलाया, कि
बेकसूर जानवरों को खालों-दवाइयों के लिये तड़पाया व सताया,
और तो और
पानी के भीतर जाकर छोटी मछलियों को तो खाता ही है, 
हार्पून बरसाकर बड़े-बड़े जलचरों का जीना तक हराम कर दिया है।     

पर्यायवरण असंतुलन, बिगड़ता मौसम 
इस बात के पक्के गवाह हैं मगर 
इंसान सृष्टि के इन ईशारों को दरकिनार करता बेहया होकर   
उनको अनदेखा कर रहा है कि 
बादल पहले जैसे हँसते हुये नहीं,
सहमे-सहमे आते हैं, रोते -रोते बरसते हैं और
अपने दोस्त पेड़ों को न पाकर सिसकिंया भरते लौट जाते हैं,
सूर्य भी अब किसी गम में चमकता है और प्रकति की हालत देख 
उसका भी रोज़-रोज़ आने को अब मन नहीं करता है,
हवा भी अनिर्णय में भड़-भड़ा कर  झटके से चलती, तेवर दिखती , 
इंसान की बनाई चीजों से कुछ अधिक ही उलझती है। 
और धरती भी इन दिनों कुछ ज्यादा कंपकंपाती-हिलती और धड़कती है।

आज चाहे 
इंसान को प्रकृती के दुख भरे तेवर नहीं दिख रहे या 
अपनी जरूरतों- वासनाओं में अँधा होकर वह इन चिंताओं को कपड़ों पर पड़ी धूल की तरह झटक ले
मगर वह समझ ले जब भी देना होगा 
खून के बदले खून में उसे इसका हिसाब  देना होगा
तभी उसका कर्जा व प्रयाश्चित पूरा होगा।   




















अब नया क्या है



पुराने के हद तक आदी हो चुके 
तुम्हारे जीवन में अब नया क्या है 
पूछो ज़रा अपने आप से.…।  
क्या तुम कुछ नया खाते हो? नया पीते हो?
नया ओढ़ते या पहनते हो?
नये लोगों से मिलते हो?
नये बिस्तर,गाड़ी या घर का इस्तेमाल करते हो?
नयी जगह पर जाते हो कभी 
नया पढ़ते-लिखते-देखते व सोचते हो?
नहीं न !
सालों-साल से 
उसी पेस्ट से ब्रश करते,
उसी ब्रांड की चाय-सिगरेट पीते,
उसी मेक के साबुन से नहाते,
वही कपड़े-जूते पहनकर, उसी बेकार तरीके के /से ऑफिस जाकर,
पुराने ढर्रे से किया-कराया काम करते और 
उसी पुराने घर आकर बासी बॉस की बुराई  करते,
अपने तय-शुदा बिस्तर के हवाले हो जाते हो..... 
क्या इससे तुम कभी अपने आप भी उकताओगे या फिर 
मरने की अवस्था तक शिथिल-निस्पंद हो चुके तुम 
मेरी यह कविता सुनकर ही जगोगे,
तुम्हारे कपड़ों में आग लगायें या 
पूरा मरने तक ऐसे ही खत्म होते चलोगे?