Saturday, October 21, 2017

विश्वास

कहने  दो 
अपनी इन सिसकियों को 
तुम जो भी मुझसे कहना चाहती हो शब्दों में 
होता यही है हरबार कि 
वक़्त पर सही शब्द 
तुम्हें मिल नहीं पाते,
तुम्हारी निर्मल भावनाओं को 
मुझतक पहुंचा नहीं पाते 
बस सूखे पेड़ों की तरह 
ठूंठ  के  ठूंठ गूंगे-अपराधी बन 
खड़े हो जाते हैं और मुझे कुछ समझा  नहीं पाते हैं 
और जो सारा कहा 
तुम्हारे अहम से निकलकर
मेरे अभिमान के लौहद्वार से टकराता है 
बेबस-लाचार और व्यर्थ हो जाता है
 अब यह छुटी 
आंसुओं की निर्मलधार ही शायद 
हमारे बीच के वहम को धोएगी 
और हमारे बीच 
विश्वास का एक नया 
बीज बोएगी !
         -------      सुरेन्द्र भसीन 














Saturday, October 14, 2017

स्ंात तिरुवल्लुवर

स्ंात तिरुवल्लुवर
” उदवि वरैŸान्रु उदवि, उदवि
 सेयाप्पट्टार साल्विन वरैŸाु।“
यह तमिल कुरल संत तिरुवल्लुवर ने 125 से 150 ई0 वर्ष पूर्व रचा था तो तब से आज तक इसका उपयुक्त भावार्थ तक कोई नहीं कर सका है फिर भी गुजारे लायक भावार्थ सम्त्राट कम्बर ने लगभग् नवीं शताब्दी में अपनी रामायण में राजा बलि की दान की महिमा को लक्ष्मण को बताने के लिए कुछ इस प्रकार किया-
“ पूर्व उपकार को ध्यान में रखकर जो उपकार किया जाता है,
वह पूर्व उपकार को र्निधारित नहीं करेगा।
 परंतु वह
पूर्व उपकार करनेवाले की हैसियत को ही प्रकट करेगा।।“
देखा, अभी भी कुरल का भावार्थ डगमगा गया, पूरा नहीं उतरा। तमिल भाषी तो कुरल का मतलब समझते ही हैं मगर दूसरे भाषा भाषी पाठकों को विदित हो कि कुरल तमिल कविता में दो पंक्तियों एक दोहा छंद है, जिसका शब्दिक अर्थ भी है अति ‘संक्षिप्त‘। तिरुवल्लुवर के एक ग्रंथ “ तिरुक्कुरल “ में 1330 कुरल थे जिनसे 133 अध्याय बने थे। संत तिरुवल्लवर 125 से 150 ई0 वर्ष पूर्व मदुरै के राजा उग्रवेलवलुदियार के समकालीन थे। उनके पिता का नाम “भगवन“ तथा माता का नाम “आदि”था मगर उनका पालन-पोषण मलियापुर के एक किसान ने किया। उनकी पत्नि अति साध्वी एवं पतिव्रता थी। तिरुवल्लवर मैलापुर नगर(मयुरों का शहर) में निवास करते रहे जो कि वर्तमान के मद्रास नगर का ही एक भाग था और वहीं तिरुवल्लवर का एक मंदिर आज भी स्थापित है। अगर आज भी उधर कभी जायंे तो उधर नारियल के पŸो ढ़के छत वाले घर हैं यानि कल्पना में लें तो  इससे भी घना गहरा वातावरण तब भी वहाँ रहा होगा क्योंकि यह सारा ईलाका समुद्र के बेहद करीब है। तिरुवल्लुवर बचपन से मिलनसार, सहृदय व हंसमुख प्रकृति के व्यक्ति थे। उनमें यात्रियों के प्रति, आगुन्तकों के प्रति, मित्रों के प्रति मैत्री भाव भी अपार था।        
साधू-संतों का आतिथ्य भी वह अपनी  शारीरिक क्षमता से भी बाहर जाकर कर आत्मा तक से कर दिया करते थे। इसलिए अतिथि के बिछुड़ने का योग उनके लिए अत्यन्त असहनीय था। मित्र विछोह से क्लांत होकर उन्होंने एक अनूठी कामना भरा कुरल लिखा, जिसके भावार्थ कुछ इस प्रकार से हैं-
”मूर्खों की मित्रता अत्यन्त सुखदायक है
क्योंकि उनके विछोह में वेदना कदापि नहीं होती।“
तिरुवल्लुवर ही एक ऐसे संत हुए हैं जिनका मंदिर भी स्थापित हुआ मगर उन्होंने कभी भी अपने जीवन भर में धर्म, ईश्वर, परमात्मा, सगुण-निर्गुण उपासना या पूजा, साधना या पूजा पद्धति के बारे में, पक्ष में या कि विरोध में अपने कुरल में कभी कुछ नहीं कहा, न ही कोई शिक्षा या प्रवचन दिया। है न आश्चर्य, कमाल का अनूठा संत। इनका सारा काम, सारा जीवन, सारा ज्ञान, सारा काव्य याकि समाज को इनकी देन सब प्रेम, आपसी स्नेह, भाई-चारे निबाहे जाने वाले संबंधों, हंसी-मजाक, व्यक्ति के आचरण आदि को लेकर ही थे। वैसे तो उनकी शिक्षाओं के बारे में सूत्र रुप में कुछ कहना अत्यन्त कठिन है मगर फिर भी हम कह सकते हैं कि वह बिना परमात्मा को बीच में लाए हुए व्यक्ति और समाज को एक दूसरे के प्रति व्यवहार व जीना सिखाते थे। तिरुवल्लुवरजी ने जीवन के उन भावों को महŸव दिया, उन पर अपने विचार व कुरल लिखे जो व्यक्ति के लिए निजीरुप में तो महŸवपूर्ण हैं मगर सामाजिक जीवन में इनको न कोई अत्यन्त महŸवपूर्ण ही मानता है, न इनपर लिखता व चर्चा करता है मगर इसी से ही समाज की महŸवपूर्ण ईकाई स्वस्थ व्यक्ति का निर्माण होता है। अच्छे चारित्रिक गुणों की शिक्षा देने वाले कुरल लिखने वाले तिरुवल्लुवर में भी ऐसे अनेक गुण थे जिनकी छाप उनके बारे में प्रचलित अनेक शिक्षाप्रद कहानियों में तो मिलती ही है इसके अतिरिक्त उनके मन के भावों को प्रतिपादित करने वाले अनेक कुरल भी हैं। यहाँ हम उनके भावार्थ ही दे रहे हैं-
“मीठे वचन जो बोलते में समर्थ हैं
वे अप्रिय कठोर वचन क्यों बोलें ?
यह काम ऐसा है जैसे कि
मीठे फल मिलने की ऋतु में
कच्चे फल खाने को ंिमलें।”                      
दूसरों के साथ जो मिल जुल कर नहीं रह सकते उनके लिए-
“यह बड़ा विश्व, दिन में भी
रात के सदृश अंधकार दिखेगा।”
परोपकार व दया के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा-
“र्निदयी धनवान अपनी संपŸिा को
छिपाकर रखते हैं
शायद वे दान के आनंद को नहीं जानते।”           तथा
“वैभवरहित व्यक्ति एक न एक दिन
बन सकता है वैभवशाली।
लेकिन जिनके हृदय में दया नहीं
उनका उद्धार हो सकता कभी नहीं।”
कुसंगति से बचने के महŸव या आवश्यकता पर-
”पानी मिट्टी के गुण को प्रकट करता है
जमीन पर बहता है और फिर उसी के समान हो जाता है।
उसी प्रकार मनुष्य की बुद्धि भी संगति के अनुरुप बदल जाती है।“    तथा
” मनुष्य की बुद्धि उसके मस्तिष्क के अनुसार होती है,
 परंतु चरित्र का निर्माण संगति से ही होता है।“
तिरुवललुवर अत्यन्त भावुक ईंसान थे मित्रता के निर्वाह में भी वह पीछे नहीे हटते थे। क्षमा करना, उपकार करना व भूल जाना उनके गुणों में था। भाषा व विचार संप्रेषण पर उनकी पकड़ ऐसी थी कि अपने अनुभवों को सटीकता से शब्दों मे भर देते थे। एक ही पंक्ति  भर में अनुभवों का अथाह भंड़ार व्यक्त क रवह मानों गागर में सागर भर देने में कामयाब हो जाते थे। उनका एक कुरल इस प्रकार का भावार्थ लिए है-
”अन्न, वस्त्र आदि सब के लिए बराबर हैं।
संकोची होना ही सज्जन को शोभा देता है।।“
तिरुवल्लुवर अपशब्दों का प्रयोग बुरा मानते थे वह कहते थे शब्दों की गरिमा व सम्मान करते हुए सदा सार्थक शब्दों का प्रयोग ही होना चाहिए ऐसा भावार्थ लिए हुए उनका कुरल है-” सुननेवालों की क्षमता को ध्यान में रख
शब्दों का प्रयोग करो। अन्यथा
धर्म अर्थ का कोई मूल्य नहीं।“                       तथा
” जो बौद्धिक स्तर पर तुम्हारे बराबर नहीं हैं
उनके समक्ष वार्तालाप करना
गंदे आंगन में अमृत बहाने के बराबर है।“
प्रेम, स्त्री-पुरुष प्रेम के सभी रंगों की वर्षा की गई है। दैहिक-प्रेम, भावनात्मक-प्रेम, अलौकिक प्रेम यानि सभी पर बड़े सुंदर कुरल रचे गये हैं। स्त्री-पुरुष प्रेम में वह दोनों को बराबर आवश्यकता वाला समझकर व्यवहार करते हैं। प्रेम महज अंत में परिणाम के स्तर पर ही सुंदर एवं सुखदायक नहीं होता उसकी यात्रा भी आनंद से, अनुभव से भरी होती है-
 “सुमन से मृदुतर है काम,
कुछ ही लोगों को प्राप्त है
उसका शुभ परिणाम।।“
काम के बारे में, पे्रम के बारे में, अपने प्रिय के बारे में जितना अधिक जानें व कहें उतना ही कम जानकारी लेने व देने का अहसास होता है। तथा एक प्रेमी जोड़ा चाहे किसी योनि का हो,जाति का हो, प्रेम की उन्मादावस्था में मिलन की, आलिगंन की अवस्था में रहना चाहते हैं, अलौकिक याकि चरमोत्कर्ष स्तर का इन्द्रिय सुख पाते हैं-
“देखना, स्पर्श करना, सूंघना, सुनना, अनुभव करना,
पंचेन्द्रियों का सुख
नायिका से पूर्णरुप से मिल जाता है।“
विरह, वियोग भी प्रेम का एक आवश्यक पड़ाव या तत्व है जिस मोड़ के बिना प्रेम वीथियों में धूमा ही नहीं जा सकता। तिरुवल्लुवर जी ने उस पर भी अपनी कलम चलाई है और अनेक कुरल लिखे हैं-
“अगर वह मुझसे बिछुड़कर नहीं जाते
ते यह समाचार मुझको बताओ।
प्रियतम के वापस आने के आश्वासन पर
जो जीते रहते हैं, उनसे कहो।।“               तथा
“आग तो छूने पर ही जला सकती है
किन्तु काम ज्वर तो बिछुड़ने पर जलाता है।।“           तथा
“यदि आँख ना ही खुले तो अच्छा है।
मेरे प्रियतम, जो स्वप्न में आते हैं मुझसे कभी नहीं बिछुड़ेगें।”
तिरुवल्लुवर जी ने परिहास, दुख, रुदन व जीवन के सभी पक्षों पर कुरल लिखे, सभी को यहाँ सम्मिलित करना तो संभव नहीं है मगर बानगी के तौर पर निम्न का स्वादन या रस हम ले सकते हैं-
ईश्यालु व्यक्ति की समृद्धि
और धर्मनिष्ठ व्यक्ति की निर्धनता
दोनो ही विचारणीय विषय हैं।     तथा
सज्जनों की सभा में मूर्ख का प्रवेश करना इस प्रकार है
जैसे साफ-सुथरी शय्या पर बिना धोये पैर रखना।            तथा
जैसे किसान खेत को निराता है
वैसे राजा दुष्टों को मृत्यु दंड देता है।      तथा
पानी में तैरने वाला फूल,
पानी की ऊँचाई जितना ही ऊपर ऊँचा होगा
उसी प्रकार मनुष्य की महानता
मन जितना ऊँचा होगा उतनी ऊँ़ची होगी।
और न जाने अनुभव के पगे कितने कुरल हैं जो समाज को सही व्यवहार, सही राह दिखा रहे हैं। तिरुवल्लुवर, ज्ञान के दृश्य माध्यम से श्रवण माध्यम को अधिक महŸव देते थे यानि पढ़ने की अपेक्षा सुन अधिक लोग पाते हैं यानि श्रवण माध्यम से या बोलकर अधिक ज्ञान प्रसारित किया जा सकता है। ऐसा उनका एक कुरल भी है-
श्रवणों द्वारा अर्जित संपŸिा ही श्र्रेष्ठ निधि है
वह अन्य सभी संपŸिायों में से श्र्रेष्ठ है।
तभी उन्होंने कुरल लिखकर ही अपनी संपŸिा को सभी में बांटते हुए बढ़ाया। तिरुवल्लवर के कुरल, शिक्षा हैं, उपदेश हैं, समाज को, प्रयास हैं व्यक्ति व समाज को सरल व उत्थानमेय बनाने की जहाँ सभी प्रेम से प्रगति करें। अभी तक के भारतीय साहित्य में ऐसा कोई ग्रंथ नहीं है जो तिरुक्कुरल ग्रंथ की समानता कर पाया हो। कहीं यह भी माना गया है कि ग्रीक कोरसों में जिज्ञासुओं को शांति प्रदान करने की सामथ्र्य नहीं है किंतु तमिल साहित्य के उक्त तिरुक्कुरल में वह शक्ति निहित है।
फूल मालायें, सम्मतियाँ, प्रशंसायें सब कुछ अद्भुत व अथाह बटोरा है इस ग्रंथकार, कवि, संत तिरुवल्लुवर ने। हम भी इनके बारे में क्या कुछ कहें व क्या कुछ छोड़ें वास्तव में तो सात्विक रंग का, सुंगध का महक भरा संदूक है जो भीतर जाकर हृदय में उल्ट जाता है।
क्वि अव्वैयार ने ठीक ही लिखा है कि-
”आध्यात्मिक सत्य का दीपक
सतत् तेजोमय प्रदीप्त़़‐‐‐‐‐‐‐
जिस तरह वह आज तक जलता रहा है
आज भी विदीर्ण करे
समस्त मानवों के हृदय का अंधकार।।”
      और यही कामना हमारी भी है।

दस्तूर /चलन

दस्तूर /चलन

अब
हम नहीं बोलते बुरा किसी को
हम नहीं कहते गलत किसी को
जो गलत होगा, बुरा होगा
खुद ही टकरायेगा
अपने जैसे किसी को,
खुद ठोकरें खाकर
सुधर गया तो ठीक
वरना टूट कर चूर-चूर हो जायेगा
अब यह दस्तूर नहीं
न ही दुनिया का चलन कि
कोई रोके किसी को, टोके किसी को
कोई नहीं दोस्त हमारा
न हम रिश्तेदार किसी के
सही हो या गलत
हम तो सबके साथ....
सिर्फ मुस्कुरायेंगे
गलत  हो या सही
गर्दन हाँ में ही
हिलायेंगे। 
               -----------              सुरेन्द्र भसीन



भ्र्ष्टाचार का श्राप

जो जानता है 
और जिसने 
भ्र्ष्टाचार छुपाया है 
वह मरेगा बीच चौराहे 
सिपाहियों की गोली खाकर.... 
फिर भी न सोचो 
कि कभी कोई सच 
छिप पायेगा....  
सच तो सूर्य है 
अंधेरे की कितनी भी हो घनी चादर 
फाड़कर सामने एक दिन जरूर आयेगा 
फ़ाइलें फाड़ देने या 
जला देने से 
तुम्हारा कोढ़ छुप नहीं पायेगा 
गंगा मईय्या  की सौगंध -
यह श्राप है तुमको 
जिनके लिए तुमने ये पाप किया है न !
उन्हीं की घृणा के नीचे 
तुम्हारा वजूद 
एक दिन सिसकेगा 
और कराहेगा !
           ------             सुरेन्द्र  भसीन   

स्ंात तुकाराम जी

स्ंात तुकाराम जी
संत कवि तुकाराम जी का जन्म महाराष्ट्र प्रान्त के पूना नगर में ’देहू’ ग्राम में हुआ। यह सन् 1598 की बात है, वे एक भले एवं खुशहाल किसान परिवार में जन्मे। उनके परिवार के पास 15 बीघे जमीन  तथा एक दुकान थी जिसमें अनाज, चावल, दालें, मसाले आदि बेचे जाते थे। कुछ धन सूद पर भी था यानि सब प्रकार का धन-धान्य उपलब्ध था। तुकारामजी के पिताजी का नाम बोल्होबा तथा माताजी का नाम कनकाई था। तुकाराम जी के खेतों में विट्ठल का एक  पुरातन मंदिर था और कई पीढि़याँ विट्ठल या पांडुरंग की पूजा करती आ रही थीं। तुकाराम जी के पूर्वज गोसावी संप्रदाय से थे इस प्रकार उनका कुल वारकरी संप्रदाय से भी जुड़ा हुआ था, नामदेव, ज्ञानेश्वर एवं एकनाथ जी से संबंधित होने के कारण भक्ति-भावना उन्हें पारिवारिक विरासत में मिली हुई थी। 17 वर्ष तक की आयु तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा मगर अगले 7 वर्षों में भाग्य ने सब कुछ उलट-पलट कर दिया, सब कुछ तिनका-तिनका होकर बिखर गया, पहले पिताजी की मृत्यु, फिर बड़े भाई का सन्यास लेना, अकाल का पड़ना,पत्नि और बेटे का भूख से मरना, दूसरा विवाह मगर कर्कषा पत्नि, उसके बाद हैजे की महामारी, खेती खत्म,सूद का पैसा बर्बाद यानि सब खो गया शान्ति, घर, परिवार, व्यापार, मान-सम्मान सभी कुछ। उन्होंने उन र्दुदिनों व उस समय की अपनी मनोदशा को अपने काव्य में यूँ व्यक्त किया है:-
स्ंावसारे जालों अतिदुःखे दुखी । मायबाप सेखीं क्रमिलिया ।।
दुष्कालें आटिलें नेला मान ।  स्त्री एकी अन्न अन्न करितां मेली ।।  
लज्जा वाटे जीवा त्रासलों या दुःखे । वेवसाय देखों तुटी येतां ।।  तथा
तुका म्हाणे कांही न धरावी आस । जावें हें सर्वस्व टाकोनियां ।।
यानि कोई कामना न रही, किसी चीज की इच्छा न रही, निराशा एवं घृणा के मारे वे सब कुछ छोड़ कर चले जाना चाहते थे। धीरे-धीरे वे एकांतवासी हो गये। खामोश, गुम, अपने में खोये रहना। अन्तर्मुखी, ध्यान में, तपस्या में लीन रहने लगे। देहू स्थान के समीप भामनाथ एवं भण्डारा की पहाडि़याँ लगती थीं, उन्हीं में दिन बिताने लगे। धर्म ग्रंथों के मनन में अब अधिक शांति व सकून मिलता। 1619 में तुकारामजी ने बाबा राघव चैतन्य को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा ग्रहण कर ली। उसी समय उन्होंने अपनी सारी संपत्ति छोटे भाई के नाम कर दी और संसारिक कार्यों से विमुख होकर अपने को परमात्मा के कार्यों में लगा दिया। निस्वार्थ भाव से किये गये प्रयासों से उनकी प्रसिद्धि फैलने लगी। उनके उपदेशों से लोग प्रभावित और लाभान्वित होने लगे। गुरु बाबा राघव चैतन्य की शिक्षाओं तथा तनमय होकर अभ्यास करने से तुकाराम जी इतने सरल एवं निर्मल हो गये कि उनका क्रोध, अंहकार, द्वेष सब गल गया। उनके एक शिष्य की पत्नि ने क्रोध में आकर उनपर गर्म पानी उडेल दिया, मगर उन्हें किंचित क्रोध न आया। उन्होंने लिखा भी है कि -
रुसलो आम्हीं आपुलिया संवसारा । तेथें जनाचारा काय पाड ।।
आम्हां इम्ट मित्र सज्जन सोयरे  । नाहीं या दुसरें देवाविण  ।।
अर्थात्, मैं संसार से रुठ गया हूँ , नाराज हूँँ तो फिर भला मुझे क्या मतलब कि लोग मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं। परमात्मा, ईश्वर ही अब मेरा मित्र, सखा और हितैषी है। तुकाराम का ईश्वर के प्रति आर्तनाद एवं विरह बढ़ता जा रहा था जैसाकि उन्होंने पद में लिखा भी है- शेवटींची विनती । ऐका ऐका कमलापती ।।
            काया वाचा मन ।  चरणीं असे समर्पण ।।
            जीवपरमात्मा, ऐक्यासि । सदा वसो हृदयेंसी ।।
            तुका म्हाणे देवा  ।  कंठी वसावे केशवा  ।।
अर्थ कि विनती यह करी है तुकारामजी ने इसमें कि मैं अपने आप को तन, मन, कर्म, और वचन से आपके चरणों में समर्पित कर रहा हूँ। मैं आशा करता हूँ कि तुमसे एकता अनुभव करता रहूँ। हे ईश्वर, मेरी वाणी में, कंठ में, उतर जाओ, बस जाओ, जिससे मैं तुम्हारी ही महिमा का गान करता रहूँ। आगे वे कहते हैं कि-
धरितों वासना परी नये फल ।  प्राप्तीया तो काल नाहीं आला ।।
त्लमली चित घातलें खापरीं  ।  फुटतसे परी लाहिचिया  ।।
तुकारामजी कहते हैं कि तुझसे मिलने की चाहत है मगर अभी तक मेरा प्रयत्न सफल नहीं हुआ है। शायद प्राप्ति में, तुझे पाने में अभी समय लगेगा। मेरा हृदय तेरे लिए विरह में ऐसे फटा जा रहा है जैसे तपते खप्पड़ में डालने पर धान फटता है। उनकी इच्छा तो ईश्वर दर्शन की थी और वह इतनी त्रीव थी कि जिसके आगे भूख-प्यास व देह का ध्या नही न रहता था- तुजविण मज कोण वो सोयरें । आणीक दुसरें पांडुरंगे ।।
               लगलीसे आस पाहा तुझें वास । रात्री वो दिवस लेखीं बोटीं ।।
               काम गोड मज न लगे हा धंदा । तुका म्हाणे सदा हेंचि ध्यान ।। तथा
न दे प्रभु मुझे कोई भी संतान
मयाजाल से मैं भूलूँ तुझे ।।
  न दे प्रभु मुझे, द्रव्य औ सुभाग ।
वही जो उद्वेग रह जाये ।। तथा आगे....
मुझसे बड़ा पापी नहीं होगा कोई, तथा आगे कहते हैं...
डर है अपार
छूटे न संसार....
अंह पर मेरे गिरने दो पाषाण
जलने दो भूषण नाम मेरा.....।   तथा
मन मेरा चंचल रहे ना निश्चल ।
घड़ी एक पल नही स्थिर ।।
और फिर एक दिन, एक पल ऐसा भी आया कि ईश्वर की, परमात्मा की, प्रभु की कृपा हो गई। अंदर प्रकाश की जगमगाहट बढ़ने लगी अपने अमिट प्रेम से तुकाराम जी की आत्मा ने अपने प्रियतम यानि ईश्वर को पा लिया, ईश्वर के चरणों में जगह बना ली, वास कर लिया। वे परमात्मा में लीन हो गये, समा गये, अब उन्हें परमात्मा हर दिशा, हर स्थान, हर प्राणी, हर वस्तु में दिखने लगा। द्वैत भाव समाप्त हो गया। तुकाराम जी यहाँ तक कहते हैं कि जब द्वैत भाव “ेमैं ” और ”तू” ही समाप्त हो गया, एकाकार हो गये तो इस अवस्था में कौन किसकी पूजा करता। यानि जीते जी का मरण हो गया, प्रभु मिलन का आनंद पा लिया। उन्होंने लिखा है कि मेरे रोम रोम में आनंद की लहर उठ रही है मेरी भावनाएँ ईश्वर में समा गई हैं जैसे उफान खाती नदियाँँ समुद्र में पहुँँचकर,गिर कर विलीन हो जाती हैं। तुकारामजी ने अभंग में लिखा है -
आपुलें मरण पाहिलें म्या डोलां । तो जाला सोहला अनुपम्य ।।
आनंदें दाटलीं तिन्ही त्रिभुवनें । सर्वात्मकपणें भोग जाला ।।
एकदेशीं होतों अंहकारें आथिला । त्याच्या त्यागें जाला सुकाल हा ।।
फिटलें सुतक जन्ममरणाचें । मी माइया संकोचें दूरी जालों ।।
नारायणे दिला वसतीस ठाव । ठेवूनियां भाव ठेलों पायीं ।।
यानि, अपना मरना खुद देखा। मेरे लिए समझना मुश्किल है ऐसी कोई और वस्तु नहीं जिससे उपमा दी जा सके। मेरे लिए तो विश्व में आनंद छा गया, मैंने पा लिया कि परमात्मा सब जगह है। जब तक मैं था मैं अंह से भरा था अब मेरा तन रीत गया, अंह भी तिरोहित हो गया, जब मैं ही न रहा तो कैसा मरना ? अपनी तपस्या के दौरान वैसे तो उन्होंने अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया मगर ”गीता“ की ओर अत्याधिक आकर्षित हो कर उन्होंने उसका अनुवाद संस्कृत से मराठी में किया जोकि तत्कालिक ब्राह्मण समाज को जरा भी न भाया परिणामतः उनका पुरजोर विरोध एवं बहिष्कार शुरु हो गया। न जाने क्यों तब के सनातनी ब्राह्मण गीता को पचा या स्वीकार नहीं कर पाते थे यानि गीता में ऐसा कुछ था जोकि ब्राह्मणों को चुभता था, उद्वेलित करता एवं धिक्कारता था। गीता का मराठी में अनुवाद व सरलीकरण फिर भला उन्हें क्योंकर स्वीकार होता अतः समाज के भारी विरोध के चलते उन्हें अपने कुछ अभगों एवं गीता  के अनुवाद को गुनाह  मानते हुए अपने ही हाथों चंद्रभागा नदी में डूबोना पड़ा, जिससे तुकारामजी का मन विद्रोह से भभक उठा और उन्होंने लिखा-
अच्छा किया प्रभु कुणबी बनाया ।
वर्ना मर गया होता दंभ से  ।।  तथा
विद्या कुछ होती । तो आपत्ति आ जाती ।।
गर्व से ऐंठता । तो यमपथ से जाता ।ं।
तेरह दिन तक उसी नदी के किनारे भूखे-प्यासे रहकर कठोर तप किया, ईश्वर को पुकारा, सिर्फ प्रार्थना और प्रार्थना, वे भी इस निर्णय के साथ कि-
तुका कहे मैंने रखा है निर्वाण ।
छोड़ दूँगा प्राण चंद्रभागा में ।।
तेरहवें दिन एक चमत्कार हुआ, आश्चर्य, एक महान आश्चर्य कि जो पोथी, डुबोई थी तुकाराम ने तेरह दिन पहले सबके सामने नदी में वह जल के ऊपर तैरने लगी। चमत्कार का प्रकाश चारों ओर फैल गया, खबर फैल गई। अब लोग उन्हें अवतार मानकर पूजने लगे, तब उन्होंने लिखा-
लोग कहते हैं मुझे देवता । मैं तो इसे अर्धम मानता ।।
अधिकार मेरा नहीं । करते हैं पूजा फिर भी ।।
मन जाने अपना पाप । कहे तुका माई-बाप ।।
शब्द व नाम की पूँजी के सहारे तुकारामजी ने प्रभु को पाया, उन्होंने लिखा भी है कि-
अणुरणीयां थोकड़ा । तुका आकाशएवदा ।।
तुका  म्हाणे आतां । उरलों उपकारापुरता ।।
यानि मैं तुका यों तो अणु से भी लघु हूँ, छोटा हूँँ, मगर साथ ही साथ आकाश जितना विशाल  भी हूँ। अब मैं केवल लोगों का भला करने के लिए जीवित हूँ, और उच्च कोटि का जीवन बिताकर, हजार, हजारों, लाखों को ईश्वर का मार्ग दिखाकर सन् 1650 में वे संसार से विलुप्त हो गये,विलुप्त यानि किसी को पता न लगा कि वे कहाँ गए, उनकी मृत्यु के बारे में कोई कुछ न जान सका, उनकी स्वाभाविक मृत्यु नहीं हुई। तुकाराम  जी की समकालीन संत बहिणाबाई ने लिखा है-
 तुकाराम तुम्हें देखते-देखते
 अकस्मात आया गुप्त रुप ।।
उनका देहवसान एक रहस्य ही रह गया मगर मृत्यु पूर्व के उनके अभंग कई मौजूद हैं-
प्रेत हुआ शरीर का भाव ।
श्मशान का ठौर लक्ष्य भया ।।  तथा
वैराग्य की उपले देह पर राखी......।
घट को घुमाया पैरों पास फोड़ दिया..... ।
तन था जिसका उसको समर्पित....  ।  इत्यादि....
मगर जो कुछ भी हुआ अनुपम हुआ, मीठा हुआ, सहज हुआ,गति से ऊपर सद्गति हुआ।

चाहतें /इच्छाएं

चाहतें /इच्छाएं
तारों-सी हमारे जीवन में
भरी होती हैं - टिमटिमाती....
दिखती हैं
बार-बार मगर
पकड़ में अक्सर नहीं आतीं....
कुछ होती हैं बच्चों के गैस भरे रंग-बिरंगे
गुब्बारे-सी आकर्षक
मगर जिद करके जकड़ो
तो फुस्स ही हो जातीं ....
पता नहीं वह हमें
सय्यम समझातीं या
हमारे जज्बात से खेल जातीं ....
चाहे जितना पीछे दौड़ो
पूरी कभी नहीं हो पाती....
          ----------               सुरेन्द्र भसीन  

हादसा

हादसा 

एक आईना होता है 
सबके भीतर लगा हुआ 
उससे सब बचना चाहते हैं 
उसके आगे 
काले होकर 
नहीं न जाना चाहते हैं 
कैसे भला ? 
कोई अपने ऐबों को देखें 
फिर निर्मोही होकर उन्हें काटे 
जैसे अपनी ही मुरझाई,
बेकार झूलती, काली-सूखी पड़ी टहनी को 
कोई पेड़ स्वयं ही काटे। 

बड़ा असंभव-सा है यह सब होना 
 मगर फिर एक दिन 
वक़्त ही निर्दयता से इसे 
कर जायेगा 
तब  हमारे जीवन में 
हादसा घटित 
हो जायेगा। 
         ------------             सुरेन्द्र भसीन