Friday, October 13, 2017

एक

एक में
एक - एक होता है,
दो में दो - एक,एक
तो तीन में तीन-एक,एक,एक...
ऐसे ही असँख्य में अनेक एक,एक,एक..
मग़र होता है सब में
वो ही
एक...।
   ----  सुरेन्द्र भसीन

Friday, October 6, 2017

रावण का वध

कोई भी शायद
मेरे नये-ताजे-नन्हें
सच के साथ नहीं आना चाहेगा
क्योंकि तब वह
सदियों से
अपने विशाल ओढे हुए
झूठ के फूटने-फटने का सदमा लेकर
वह कहाँ जायेगा ? कि
रावण को राम ने नहीं मारा-
रावण को तो सीता के तिरस्कार ने मारा।
और रावण को किसी ने नहीं जलाया -
वह तो उस दिन से
भीतर  से जलने लगा
जिस दिन सीता ने
उसके पुरूषत्व की अवहेलना कर
राम को स्वीकारा......
सोचा है कभी
जब हमारा पुरूषत्व /अहम
दांव पर चढ़ा होता है
तब हमारे भीतर
क्रूर अटटहास करता, जलता हुआ
एक रावण क्या नहीं खड़ा होता है ?
जो हमारे बीच
वासना बन बसता है और
हर बार
बाहरी रावण को जलाने के
हमारे इस आडंबर पर
विभित्स हंसी हँसता है।
           ----------                  सुरेन्द्र भसीन          





















Tuesday, October 3, 2017

आस्था का चमत्कार

किसान
व्यापारी या शहरी बाबू से
ज्यादा आस्थावान होता है
जो प्रकृति से पाये बीजों को
एक-एक करके अपने हाथों
धरती में गोड़ता(दबाता) है
उनके सौगुना हो जाने 
फिर से उपज आने को
आस्था का चमत्कार
फिर से हो जाने को।
       -----  सुरेन्द्र भसीन

Sunday, October 1, 2017

बैरंग

अभी
हम कहाँ हैं?
जानने के लिए ही
अपने से वर्षों, सैकड़ों कौस
भटकते-भटकाते
झूठे-सच्चे सम्बन्धों के तानो-बानो से
उलझते-निकलते
उखड़ी जीवन राहों से गुज़रकर
बैरंग
लौट तो आए हैं हम
अपने ही भीतर।
मग़र पूरा जीवन
अपने से क्या चाहते थे
फिर भी....जरा भी
समझ नहीं पाए
हैं हम?
  ----   सुरेन्द्र भसीन    

Friday, September 22, 2017

लफ्जों की न कोई आवाज़ करो.... (गीत)

यूँ  ही रह जाने दो इन चुप्पियों को 
चाहत की न कोई आवाज़ करो 
न कुछ पूछो हमसे  
न कोई अपनी बात करो 
बह जाने दो इनको हमपर से 
लफ्जों की न कोई आवाज़ करो....   

ये बेलगाम बातें  
पहुँचाती नहीं कभी ठिकाने तक 
फिर हम  क्यों इनके आघात सहे 
शोर ही भरता  जाना है कानों में तो 
 क्यों कोई आवाज़ करे.... 
यूँ ही रह जाने दो इन चुप्पियों को 
लफ्जों की न कोई आवाज़ करें ?
        -----------           सुरेन्द्र भसीन 

Monday, September 18, 2017

बार बार..लगातार...

बार बार..लगातार...  

मैं 
तारकोल हूँ ?
रोड़ी-बजरी हूँ या 
कुछ और.... ?
यह मुझे तो नहीं मालूम मगर 
हर बार मैं ही राह बना दिया जाता हूँ.... 
झूठे वायदों,तरक्की व योजनाओं के 
भारी-भरकम ट्रकों की राहों की  
सड़क बना बिछा दिया जाता हूँ। 

मुझसे होकर ही 
वे गुजरते तो हैं 
मगर पता नहीं वे कहाँ जाते हैं ?
कम से कम मेरे काम तो 
वे नहीं आते हैं। 

जब-जब मैं 
टूट-फूट जाता हूँ,
उखड़ने लगता हूँ तब  
कुछ और मेरे जैसे आ जाते हैं,
मिला दिए जाते हैं-
रोड़ी बनाकर,बजरी बनाकर, तारकोल मिलाकर 
तरक्की, वायदों या योजनाओं की राहों में... 

सोचता हूँ मैं 
कि मेरे लिए यह समूचा वक़्त ही काला है 
या मैं काला ही जन्मा हूँ ?
जो खुद न कहीं आता हूँ 
न कहीं जाता हूँ 
मगर दूसरों के लिए सदा 
सड़क बना, 
उनकी सुविधा बना, 
तलुवों में बिछा दिया जाता हूँ 
बार बार... लगातार..... । 
             --------       सुरेन्द्र भसीन   














Saturday, September 9, 2017

बड़े की परिभाषा

आजकल किसी का
कुछ भी कहा 
किसी को भी
अच्छा  नहीं लगता
कोई कुछ सुनना नहीं चाहता।
सब चिड़चिड़ाए हैं और 
क्रोध में भरे हैं
अपने से खीझे
अपने से ही लड़े हैं। 
फिर कहते हैं हम
बड़े हैं .....
         ----------    -सुरेन्द्र भसीन