Sunday, December 20, 2015

रूपांतरण

बाग़ या जंगल से 
अकेला 
       गुजरते।  मुझे अक्सर 
       ये फूल-पौधे-पेड़ 
हाथ बढ़ा कर पकड़ 
रोक लेते हैं। अपने भीतर खींच लेते हैं। 

फिर निकट बिठा 
         विह्वल नन्हें बच्चों की तरह 
         अपने रंगों गंधों-रूपों के 
         खज़ाने 
         मेरे आगे उड़ेल देते हैं.... 
फिर झरनों-से खिलखिलाते रहते और 
गुदगुदाते हैं.....  

मैं भी तब स्वयं को भूल 
रंगों-गंधों में डूब 
उन्हीं में मिल जाता हूँ !..... 

            -----------    baldev vanshi
        ........... 

अग्नि पाताल (धनबाद /झरिया )

झर रही है मौत 
दिनरात / झरिया में 
बरस रही है बरसों बरस 
पलक झपकते ही धंस जाते हैँ मकान 
लोग। जिन्दा। किलकारियां। खुशियां 
बदल जाती हैं चीखों में।  खामोश !..... 

कहीं लपटें हैं 
कहीं धुआं 
कहीं सुलगते कोयले -
                खदानों में 
लपटें और लोग जी रहे हैं 
साथ-साथ 
इन जीवित श्मशानों में !...... 

कब धंस जाये  धरती 
देखते देखते 
कोई गायब हो जाये 
साथ चलते-चलते 

बगल में ही धरती के नीचे 
लपटें चाट रहीं हैं धैर्य। सांसे। आशाएं 
पर जीवन है कि उसी धरा पर झुग्गी डाले पड़ा है 

जब तक सांसे हैं।  लोग आबाद हैं 
लपटें हैं।  अग्नि पाताल पाताल है !
झरिया है ! धनबाद है !
                -----------           baldev vanshi

मनुष्य ही बचा सकता है मनुष्य को

मनुष्य की महिमा-ममता को, सिर्फ 
मनुष्य ही बचा सकता है 
जैसे ईश्वर को, धरती को 
आकाश को, फूलों को......   

फिर से उद्यम करो 
कि फूल महकें 
आकाश में सुर्यालोक 
धरती पर मनुष्य के कंठ से 
ईश्वर चहके..... 

प्रातः भावनाओं की पत्तियों पर 
सजीले ओस कण संवेदनाओं से 
अनुभूतियों से 
आदिम गंधों से बहकें...... 
        .......   

ईश्वर के नाम पर 

अभी तो 
शस्त्र संभाल रहे हैं लोग 
तुम्हारे नाम से रचे शास्त्रों को 
मध्य में रख कर.....

अध्यात्म बोल बोल रहे हैं 
हिंसक आशाओं से घिरी छायाओं में 
शब्द और अर्थ को पृथक-पृथक 
हत्या कर।  सत्य की सौगंध खा रहे हैं 
वे सब 
अब तुम्हारी ही ओर आ रहे हैं 
प्रभु !
           .......     

रक्त सने 

अपने ही रक्त-संबन्धों के रक्त से सने 
आरक्त हाथों-वस्त्रों से 
ये समझकर लोग /कितने नासमझ-पाप में लिप्त हैं 
इन्हें  श्रमा करो / मुक्त कर दो ऐ प्रभु 
इस बार !....... 
           ..........            baldev vanshi


लाज

क्योंकि समय को लाज आती है 
समाज को भले न आये 
उघड़ता जा रहा समाज-व्यक्ति 
कपड़ों में ज्यादा पहन कर भी..... 

जररूत स ज्यादा खा कर 
व्यक्ति मरता है 
अधिक कपड़े पहन 
             उघडता है। 

आजकल की नहीं 
युगों पुराना सत्य है 
आज कौन देखता है 
असत्य ही लुभाता है 
राजा-प्रजा को समय ही बचाता है 
अपनी ओट में लेकर 
क्योंकि समय को ही 
लाज आती है जितनी 
उतनी दुनिया को 
मोहलत मिलती है जीने की 
अपने सभ्य वस्त्रों को 
आँख बचा सीने की 
देख समझ जीने की मौत को 
गले लगाने और आँखों -देख 
मक्खी निगलने की 
कोई नहीं करता अनदेखी.....

मौत भी नहीं आती बता कर 
जब भी घेरती है 
आंख बचा कर 
क्योंकि समय को लाज आती है ! 
                     ----------          baldev vanshi

दूरी

बढ़ते हुए काल में 
हमारे मध्य की दूरी बढ़ रही है 
और अंत की दूरी घट रही है.....

पहाड़ों को काट कर पत्थर, रोड़ी, बजरी 
बनाने के क्रम में 
पेड़,बत्ते, तखते, बारुदा बन रहा है 

आकाश को छोटे-बड़े तहखानों, मकानों  में 
बदलते जाने को वायु तक कटा-फटा 
वजह-बेवजह धमनियों-आँतों-शिराओं में 

पानी को बे-पानी किये दे रहे नालायकी में 
सब के सब स्वयं ही स्वयं के शत्रु बन रहे  

शिव  और शिवत्व का जन्म 
हरियाली और पेड़ों, फूलों, फलों का 
खुशबुओं का जन्म 
अन्न और अन्न की बाली का जन्म.....

बढ़ रहा  मध्य  का अंतराल 
घट रहा अंतकाल 
हमारे बीच अब रुकती नहीं हवाएं 
बदरंग, बहकी, बावली-सी गुजर जाती हैं !...... 
लगता है दूरी और बढ़ रही है !!
                    ---------            baldev vanshi









Saturday, December 19, 2015

अनंत यात्रा विश्व

सामने 
दृश्य रूप में  
केवल एक विशाल दीर्घ दृश्यचित्र 
चल रहा है लगातार 
परंतु हजारों दृश्यों की  चित्रावलियां 
              भिन्न-भिन्न एपिसोड 
विभिन्न चैनलों पर चल रहे हैं। 

समानांतर अनेक आयाम 
अनेक पक्ष 
अनेक चित्र-विचित्र परिदृश्य 
                           गतिमान चल रहे....... 

चैनल बदलो / देखो -
तो समांतर चलते दूसरे दृश्यों पर 
कूद जायेंगे 
हैरानी में 
कि हम अब जिन्हें देख पा रहे हैं 
चैनल बदलते 
     फिर उन्हें देख नहीं पायेंगे !...... 

पूरा विश्व फलक 
विभिन्न चैनलों 
विभिन्न दृश्यों का 
         समांतर संचालन है !..... 

जितने जीव  प्राणी 
उतने जीवन रूप /उतनी विविधताएं 
उतनी यात्राएं !

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मुक्ति 
सको तो 
तेतीस कोटि जीवन आयामों में 
अनुभूति     भाव यात्रा करो /वेदनाओं में 
मुक्त्त हो 
इन आयामों में 
इसी जीवन में 
       मुक्त्त हो जाओ !
सको तो.....! 
              ----------           baldev vanshi

यहीं खोदो ! यहीं -


          अभी थोड़ी देर पहले 
          आवाजें आ रहीं थीं 
          मलबे के नीचे से - 
                  "अरे कोई है ?"
                        "कोई है ?"..... 
आवाजें 
धीमी पड़ती हुईं बंद हो गईं 
मर गईं शायद। 
पर सांसें अभी जिंदा होंगी 

सांसों के मरते भी 
समय लगता है 

जल्दी जल्दी खोदो 
अभी जिंदा मिल सकता है  
आदमी..... !
विश्वास 
खो गया है।  देखते देखते 
आदमी मिट्टी हो गया है !

मरी मिट्टी 
किसी काम नहीं आती 
इस से तो कुल्हड़ तक नहीं बनता 
कण से कण नहीं पकड़ता 
वे ही विश्वास दुख दे गये 
जिन्हें सहेजा था जतन से 
परिंदे भी छोड़ गये 
खंडहर मकानों को। 
मृत्तकों की भटकती आत्माएं 
ढूँढती फिर रहीं 
अपनी जिंदा पहचानों को !...... 
            ----------        baldev vanshi