Monday, August 3, 2015

चाँद की चिंता

एक रात 
मैं घर से निकला तो 
चाँद आकाश पर नहीं था।  
बाजार पहुँचा तो वहाँ 
चौराहे पर चाँद गिरा पड़ा था औन्धे मुँह 
और लोग बेफ़िक्र..... 
किसी को उसकी परवाह ही नहीं थी। 
मैं चाँद को उठाकर घर ले आया,
फिर झाड़-पोंछकर 
बड़े यत्न,पूजा,प्रयासों से 
उसे आकाश में पहुँचाया। 
अब जब भी रात मैं घर से निकलता हूँ,
और किसी को दिखे न दिखे 
चाँद मुझे जरूर दिखता है,
मेरे घर से बाजार और बाजार से घर तक का
सफर वह मेरे साथ ही करता है,  
मुझे देखकर सदा हँसता है और 
शायद यही मेरा और 
चाँद का रिश्ता है। 

पीड़ायें कैसी-कैसी


पीड़ायें भी तो 
तरह-तरह से सताती हैं हमें। 
दैहिक पीड़ा से बड़ी होती है -
मानसिक पीड़ा। 
और फिर आती है आत्मिक पीड़ा। 
मगर इन सब से भी अधिक हमें वो 
सताती है जो हमारे भीतर नहीं 
हमारी ओर आती नजर आती है हमें,
हवाओं में दर्द का गुप्त अहसास बनकर।
तब हम समझते हैं कि
पीड़ा से पीड़ा का अहसास बड़ा होता है क्योंकि  
वह न होते हुये भी घेरती है हमें  
हमारे पापों का अदृश्य परिणाम बनकर। 
वह सुखाती-निचोड़ती है हमारे जीवन रस को भीतर से 
और धकेलती है हमें हमारे दुखांत की ओर 
व हमारे जीवन को नासूर बना जाती हैं। 









नकारत्मकता का बोझ

हृदय पर
नकारत्मकता का बोझ बढ़ते ही,
शरीर भी थका-थका, बोझिल-बोझिल हो जाता है,
फिर चाहे 
दो उसे घंटो आराम, रखो निष्काम, मगर
स्फूर्ति का अहसास उसमें जग नहीं पाता है,
जब तक कि ह्रदय पर रखा बोझ उतर नहीं जाता है। 
गीले काले कंबल-सी नकारत्मकता से, उदासी से, 
थक, उचाट, भारी हो चुका शरीर 
हाथी-सा ऐसे एक जगह पड़ जाता है कि भीतर के सभी प्रयासों को असफल करता लाख उठाने पर भी नहीं उठ पाता है। 
आशा की, उम्मीद की किरण या 
समय का महावत ही अब समझा-उठा पायेगा इसको -
कि उठो ! बढ़ो आगे !
ठहरने से नहीं
जीवन में गति करने से ही 
ह्रदय से नकारत्मकता का पहाड़ टूट जाता है। 

अनिर्णय का भय

अनिर्णय की अवस्था ही 
जन्मती है अगर-मगर की अनजानी डगर को, 
जो होती है
काली,अंधेरी, अंतहीन।
जिस पर चल तो पड़ता है हर कोई 
उसे सरल मानकर, अपनी राह चुनकर।
पर मंजिल तक तो वो ही पहुँच पाता है 
जो इस, 
अगर-मगर की डगर को लाँघ-निपटाकर, 
निर्णय के गंतव्य तक पहुँच पाता है
वरना बाकियों को तो उसका तारकोल की लिपट जाता है। 
जो छुटाते नहीं छूटता, 
और मुश्किल कर देता है जीवन राह को। 
हर चौराहे पर प्रशन और बड़े होकर 
लेते है जाते हैं - वृहद-दैत्याकार रूप 
भींचते कलेजे को मुट्ठी में, दलते देह को 
करते कदम-कदम पर निर्णय की माँग,
ओर-ओर कठोर, निर्मोही होकर। 














काबलियत


जैसे हर तारा
एक-सा नहीं दमकता आकाश में,
हर फल एक-सा सुगठित नहीं होता,
हर फूल एक-सा सुंदर-खूबसूरत नहीं होता,
हर रचना भी महान नहीं हो सकती और 
हर नवजात एक-सी काबलियत लेकर नहीं पैदा होता
वैसे ही हरेक की तरह तुम्हें भी जन्मा है,भेजा है 
कुछ निष्चित विशेषताओं को लिये हुये ईश्वर ने इस संसार में
और समझो कि
महान आदमी के कोई सींग या पंख नहीं होते उघड़े हुये
मगर अंतर्रात्मा से 
वे एक खिले रूप होते हैं परिपक्व फूल की तरह,
आकाश में होते हैं पूरे अहसास की तरह,
फल होते हैं जीवन रस से लबालब और लबरेज,
और धरती पर पैदा होते-उतरते हैं 
एक धन्यवाद रूपी, प्रेम-प्रार्थना की तरह। 

Sunday, August 2, 2015

पेड़ का महत्व

हवा फुसफुसाती 
पेड़ के कानों में कुछ,
पेड़, हँसने-झूमने लग जाते हैं मस्ती में 
अपनी जिज्ञासा में जलता-सोचता मैं..... 
हवा से पेड़ का जो नाता है,
हमसे क्यों नहीं बन पाता है ?
क्योंकि इन्सान दूषित करता हवा को 
पेड़ प्रदूषण मिटाता है इसलिये 
इन्सान से ज्यादा 
पेड़ महत्व का हो जाता है। 

पागल कहलाने से पहले


अपनी सनक को,  
अपने विचलित-विचारों को 
अपने ही भीतर सिमित-समाहित रखो 
वरना लोग तुम्हें रुग्ण कहेंगे,पागल दे देंगे करार, 
और तब तक तुम्हारा इलाज करायेंगे 
जब तक कि उन्हीं की तरह स्पष्ट दायरानुमा,
परंपरागत,सामाजिक परिपाटी वाला सोचने न लगो 
और उनकी बाँधी सीमाओं को न करने लगो स्वीकार। 
अच्छी तरह मास्टरों,नेताओं व धर्मात्माओं से ठोक-पीटकर
बनाये गये तुम जैसे सामाजिक पुर्जों में खम व गम आ जाने पर 
पहले वह उसका इलाज कराते हैं,
फिर पड़ा रहने देते हैं एक तरफ यार्ड में,
कबाड़ में या पागलों के अस्पताल में निष्काम सालों-साल 
फिर भेज देते हैं रिश्तेदारों में सामाजिक रहमों कर्म पर 
समय के निर्मम हाथों में धीरे-धीरे जिबहा होने के लिये।  
तुम अपने साथ ऐसा निष्ठुर व्यवहार तो नहीं चाहते होंगे न। 
तो भीतर ही पूरी तरह पकाओ-पनपाओ अपने विचारों को 
फिर उन्हें व्यवस्थित रूप देकर सहनीय-सराहनीय बनाकर 
धीरे-धीरे वक्तनुसार ही लोगों को बताओ,
तभी होंगे वे स्वीकार।
वरना,तुम और तुम्हारे विचार 
चाहे कितने उपयोगी व कीमती हों तुम्हारी नजर में,
तुम रहो पागल कहलाने के लिये तैयार।