Tuesday, June 16, 2015

क्या अजीब है ?



पत्थर से पूछो 
तो उसे नहीं मालूम कि उसमें क्या अजीब है।  
वह तो चीज़ों से टकराता, तोड़ता-फोड़ता
कुछ और सख्त व पथरीला ही हो जाना चाहता है,
अपने स्वभाव में और कठोर व मजबूत। 

हवा अगर तेजी से बहकर 
सब कुछ उड़ा देती है तो भला 
हवा में हवा के लिये अपने इस कृत्य में, स्वभाव से बाहर क्या है?

अग्नि सब कुछ जलाकर राख कर देती है 
तो उसकी नजर में भी उसमें उसका क्या कसूर ?

पानी भी जब चाहे 
बेकाबू होकर झोंपड़े-मकान, खेत-खलिहान सब बहा देता है 
तो उसमें उसका स्वभाव भी क्या अजीब है ?
सबका स्वभाव तो दूसरों के लिये ही हैरान कर देने वाला होता है सदा,
वैसे तो सब अपने में ही होते हैं और अपने 
किसी विशेष गुण के लिये ही बने होते हैं। 
अब सोचो ज़रा हटकर 
कि पत्थर अगर तनिक हल्का व कच्चा होता,
अग्नि कुछ ठंडी होती या पानी का द्रव्यमान न होता।
तो ये हमारे किसी काम आते ?

वास्तव में प्रकृति नहीं-
हम इस्तेमालकर्ता ही अज़ीब हैं,
जो हड़बड़ी की गड़बड़ी में 
चीजों को उनके स्वभाव में नहीं 
अपनी जरूरतों में चाहते हैं,
और यों स्वार्थी बनकर प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते ही जाते हैं,
यातना व पराकाष्ठा की सीमा तक उसका दोहन करते हम
सजा पाने की अवस्था में तिलमिला कर कहते हैं-
कि ये प्रकृति व चीजों की प्रकृति बड़ी अजीब है। 























अनाम यात्रा



जीवन  है जैसे 
पहाड़ी यात्रा का सफर 
चढ़ते जाना 
ऊँचे-ऊँचे और ऊँचे 
जहां पल प्रति पल 
होते जाते हैं हम अपनों से दूर और दूर..... 
छोटे और बौने होते सब..... 
सभी को ऊपर कोई चोटी पर बुला रहा है.… 
हमसाया ही है कोई ऊपर हमारा
चोटी पर पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं है पर 
हर कोई दौड़ता-हांफता 
इसी उम्मीद से चढा जा रहा है कि 
उसे ऊपर ही मिलेगा आराम 
जहां करना नहीं होगा कोई काम 
बस निश्चिन्त- निश्चिन्त आराम। 
ऊपर बादलों से छूती हुई चोटी 
मानो चोटी पर पहुंचकर 
एक पांव बढ़ाया 
और आकाश में ग़ुम हो जाना है,
हल्के हो जाना है बादलों की तरह
बादलों का ही हिस्सा होकर 
बादलों की तरह उड़ना भी है छिन्न -भिन्न होकर और 
एक  भी रहना है.… 
टूटना है... जुड़ना है.. जुड़ना है... टूटना है..... 
बरसना है... बादल भी होना है 
फिर फिर धरती पर आने के लिये 
आत्मा भी होना है, देह  भी  धरना है।      

















सूखे हम



जितना बड़ा पूरा 
आकाश व प्रकाश बाहर है 
उससे भी अधिक 
आकाश व प्रकाश का फैलाव
हमारे भीतर भी होता ही रहता है श्रण-श्रण --
ऊर्जा रश्मियों के अनगिनत विस्फोट होते ही जाते हैं--  
लेकिन हम इन्हें महसूस नहीं कर पाते 
क्योंकि हम कभी अपनी भीतरी यात्रा पर नहीं जाते हैं

भीतर भी हमारे एक भरा-पूरा जहान है - खेत व खलियान हैं 
विचारों के बागान हैं। 
जिन्हें हम सीँच नहीं पाते हैं 
बाहरी भाग-दौड़ में लगे हमको 
अपने को जानने-समझने में ही सालों-साल लग जाते हैं,
न ही हम इन्हें इनके मित्र - 
पुस्तकों व कला का संसार ही दे पाते हैं।  
इसलिय हम इन्हें और ये हमें सूखा ही छोड़ जाते हैं।    







मूर्ति /कलाकार





मूर्ति है, 
कि कलाकार है,
न जाने कौन किस को बनाता है ?

मूर्ति में कलाकार 
कि कलाकार में मूर्ति 
न जाने कौन किस में समाता है ?

बन जाये तो मूर्ति कला 
और न बने तो 
कलाकार ही मूर्ति हो जाता है।      


Monday, June 15, 2015

मेरे पाप



वो दिन 
कहाँ से शुरू किये थे तुम जीवन अपना... 
माँ के सूखे टिकलों, मटके का पानी,
व टूटी चारपाई से सजी झोपड़ी-भरी 
सुविधाओं व सकून के अकेले मालिक ... 
धीरे-धीरे करके जब तुम अपना मकान बनाते हो 
तो भीतर से कितने-
पपोले-कच्चे व कमजोर हो जाते हो,
ईंट-ईंट करके इतना झुक जाते हो कि 
अब सीधी कमर खड़े भी नहीं हो पाते हो। 
सपनों के सौदागरों से 
अपनी नींद का अधिकार खर्च कर 
सोने के लिये गद्दे व तकिये लाते हो तो 
कब इनका इस्तेमाल कर पाते हो और 
तिज़ारत का कौनसा कायदा निभाते हो। 
तुम जानते हो 
जब यहाँ टी वी नहीं था 
मगर तुम्हारे पास वक़्त व सकून तो था 
अब समय बेचकर तुम यह ले भी आये हो तो 
इसका क्या करोगे ?
तुम्हें मालूम नहीं कि तुम्हारी सुविधाओं व चैन के बीच का संतुलन 
कहीं खो गया है,
सामान जुटाने की होड़ में तुमने सुविधायें नहीं, आराम नहीं
जरूरत से ज्यादा जो वस्तुएँ जुटा लीं हैं 
जीवन के इस अंतिम दौर में तुम इनका क्या करोगे ?
पड़ोसियों से की गई ईर्ष्या व होड़ का भी नतीजा 
अब तुम्हारे सामने अस्पताल के बैड के रूप में आया है। 
क्या इसी तरह के सकून  व आराम की तुम्हें तलाश थी
बड़ी-बड़ी खुशियाँ जुटाने के लिये छोटी खुशियों को तो कहीं
तुमने पीछे ही छोड़ दिया।

अब डॉक्टर न जाने 
कितने तरीके के mysin (मेरे पाप) के 
इंजेक्शन लगायेगा और 
जीवन भर की गई गल्तियों और पापों 
का प्रायश्चित करायेगा।          

















कविता




जब 
मस्तिष्क के आकाश में 
विचारों के घने बादल टकराते हैं,
तो, तड़ित कर 
मन से होती हुई,
हाथों के रास्ते,
कलम से कागज पर 
जो अर्थ कर जाती है 
वह कविता हो जाती है।  

उलझन





एक मैं-मन,
एक मैं-आत्मा और 
एक मैं-परमात्मा, तीनों ही 
रहते हैं अपने-अपने भाव के साथ इस देह में 
इसे संचालित करने को

मैं-मन 
तो इसे बाहर यहाँ-वहाँ खूब दौड़ाता है,
जहाँ-तहँआ टकराता है 
और वासना की झाड़ियों घायल होने को बार-बार उलझाता है   

मैं-आत्मा, अच्छे-बुरे का ज्ञान रखता पुराना अनुभवी
मैं-मन को भीतर-भीतर सिखाता है,
उसे वस्तु-इस्थिति समझाता उसे 
रोकता-टोकता कि -
रुको-देखो-सही-चुनो और चलो क़ह-क़ह कर 
सही-गलत के द्व्न्द में उलझाता है।  

और मैं-परमात्मा सिर्फ देखता भर है 
कहता कुछ नहीं कभी 
संकेत मात्र में घूरता,आँखें तरेर,कहता-सा 
ऊपर आओगे तो बताऊंगा ?

इन तीनों में 
फँसा-खिंचता-उलझा -उलझा मैं 
डरता क्या करूँ ? क्या न करूँ ?