Tuesday, May 26, 2015

सीख



ऊँचे पहाड़ों से
यूँ ही नहीं पहुँचता पानी
झरने से होता हुआ नदिंयों तक।
वह अपने रास्ते की चट्टानों से टकराता
उन्हें रगड़ता -तोड़ता -मेटता ,
उनके  बारीक से बारीक छिद्रों का लाभ उठाता
और मजबूर करके उन्हें अपने संग घसीट लाता है
नदियों  व मैदानों में।
यह हमे यही तो सिखलाता है कि भले
जीवन की समस्याऐं बनी हों कितनी भी कठोर चट्टानों से
मगर उनको बहा कर
चलते जाना ही जीवन है।  

बचपन



ज़रा सोचो तो 
बच्चे भला कहाँ से आते हैं? 

बच्चे तो हमारे भीतर बचपन में ही होते हैं बीज रूप होकर 

जब हम बड़े होते हो जाते हैं 
तो हमारा बचपन भी 
बाहर निकल जाता है बड़ा होकर
इसलिये फिर कभी 
हम बच्चे नहीं हो पाते हैं 
चाहे हम बूढ़े हो जाते हैं 
बच्चे नहीं हो पाते हैं।  

Saturday, May 23, 2015



बच्चों के हाथों 
छूटी कागज की नाव बहती जाती नदी में … 
भला अपने अनुभवों को 
तट पर खड़े लोगों को 
वह कहाँ सुना पायेगी 
कि नदी कितनी गहरी है ?
कि नदी का पानी कितना ठंडा है ?

जब तक वह किनारे पहुँचेगी 
नदी के पानी में पसीजकर 
नदी का ही 
हिस्से बन जाएगी। 

अनाम पन्छी



मुझसे 
ये बार-बार क्यों पूछते हो कि मेरे भीतर
 क्या है? कौन है ?
जो मेरे भीतर 
समय-असमय आता है,
नाचता है,गाता है, कूकता है,
हँसता है,कवि बन कहता है और 
अनाम पन्छी बन उड़ जाता है। 
सच पूछो तो 
मैं भी इसे नहीं पहचानता,
न ही दे सकता हूँ इसे कोई नाम, कोई आकर। 

मैं तो 
दुआओं में, प्राथनाओं में ही रत हूं लगातार 
कि आओ 
मेरे में बसो 
और कैसे भी, जैसे भी 
इन फ़िज़ाओं में फहरजाओ। 










Friday, May 22, 2015

धरोहर




तुम्हारे 
जीवन भर के संचित अनुभव
व्यर्थ नहीं जाते कभी। 
देह छोड़ते ही 
तुम्हारी आत्मा उन्हें ले जाती है अपने साथ 
एक नये बीज का सत्व बनाने 
और रोपती है 
एक नई ताजी कोमल देह में। 

इसी तरह धरोहर  जो 
आगे जाती है संस्कार बनकर काम आती है। 
इसी तरह 
हाँ.. ना..., सही.. गल्त 
की जमीन पुख्ता होती जाती है।   

परिचय



अपनी 
इस लंबी उम्ह्र तक आते- आते 
तुम अपने बारे में क्या-क्या  जानते हो ?
उतना,
जितना कि समाज ने बताया ?
याकि उतना जितना घटनाओं से टकराकर तुमने पाया। 

अपने बारे में 
अपने से छिपते तुम 
स्वयं कब पूछोगे  
और अपने आपको सम्पूर्णता से कब  जानोगे ? 








Thursday, May 21, 2015

प्रकृति का पेड़



ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को 
उसके पॉँव मिल जायें 
वह नाचने लगे 
हमसे लिपटने लगे,गले लग जाये 
हमारे संग दौड़ कर दिखाने लगे,
अपनी ख़ुशी में शामिल करने को 
अपनी अनगिनत डालों या कंधों 
पर बैठा कर झुलाने लगे। 

ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को आवाज मिल जाये
और वह हमें हमारी तरह 
बोल -बोल कर दिखाने लगे ,
और भावनाओं में बहकर 
ऊँचे स्वर में कोई मीठा गीत गाने लगे। 

ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को पर मिल जायें 
वह एक जगह खड़ा न रहे 
उड़- उड़ कर अनजान प्रदेश जाने लगे 
और तरह- तरह के पहाड़ों -झरनों व नदियों को 
अपने उड़ान के खट्टे -मीठे तजुर्बे बताने लगे। 

मगर ऐसा होता नहीं है कभी 
प्रकृति का पेड़ 
चाहे कितना भी ललचाये 
जो प्रकृति ने उसे नहीं दिया 
वे पैर या पर 
वह पा नहीं सकता 
और प्रकृति के नियम को 
कोई भी झुठला नहीं सकता।