Saturday, May 23, 2015



बच्चों के हाथों 
छूटी कागज की नाव बहती जाती नदी में … 
भला अपने अनुभवों को 
तट पर खड़े लोगों को 
वह कहाँ सुना पायेगी 
कि नदी कितनी गहरी है ?
कि नदी का पानी कितना ठंडा है ?

जब तक वह किनारे पहुँचेगी 
नदी के पानी में पसीजकर 
नदी का ही 
हिस्से बन जाएगी। 

अनाम पन्छी



मुझसे 
ये बार-बार क्यों पूछते हो कि मेरे भीतर
 क्या है? कौन है ?
जो मेरे भीतर 
समय-असमय आता है,
नाचता है,गाता है, कूकता है,
हँसता है,कवि बन कहता है और 
अनाम पन्छी बन उड़ जाता है। 
सच पूछो तो 
मैं भी इसे नहीं पहचानता,
न ही दे सकता हूँ इसे कोई नाम, कोई आकर। 

मैं तो 
दुआओं में, प्राथनाओं में ही रत हूं लगातार 
कि आओ 
मेरे में बसो 
और कैसे भी, जैसे भी 
इन फ़िज़ाओं में फहरजाओ। 










Friday, May 22, 2015

धरोहर




तुम्हारे 
जीवन भर के संचित अनुभव
व्यर्थ नहीं जाते कभी। 
देह छोड़ते ही 
तुम्हारी आत्मा उन्हें ले जाती है अपने साथ 
एक नये बीज का सत्व बनाने 
और रोपती है 
एक नई ताजी कोमल देह में। 

इसी तरह धरोहर  जो 
आगे जाती है संस्कार बनकर काम आती है। 
इसी तरह 
हाँ.. ना..., सही.. गल्त 
की जमीन पुख्ता होती जाती है।   

परिचय



अपनी 
इस लंबी उम्ह्र तक आते- आते 
तुम अपने बारे में क्या-क्या  जानते हो ?
उतना,
जितना कि समाज ने बताया ?
याकि उतना जितना घटनाओं से टकराकर तुमने पाया। 

अपने बारे में 
अपने से छिपते तुम 
स्वयं कब पूछोगे  
और अपने आपको सम्पूर्णता से कब  जानोगे ? 








Thursday, May 21, 2015

प्रकृति का पेड़



ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को 
उसके पॉँव मिल जायें 
वह नाचने लगे 
हमसे लिपटने लगे,गले लग जाये 
हमारे संग दौड़ कर दिखाने लगे,
अपनी ख़ुशी में शामिल करने को 
अपनी अनगिनत डालों या कंधों 
पर बैठा कर झुलाने लगे। 

ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को आवाज मिल जाये
और वह हमें हमारी तरह 
बोल -बोल कर दिखाने लगे ,
और भावनाओं में बहकर 
ऊँचे स्वर में कोई मीठा गीत गाने लगे। 

ऐसा भी 
होता है कभी 
कि किसी पेड़ को पर मिल जायें 
वह एक जगह खड़ा न रहे 
उड़- उड़ कर अनजान प्रदेश जाने लगे 
और तरह- तरह के पहाड़ों -झरनों व नदियों को 
अपने उड़ान के खट्टे -मीठे तजुर्बे बताने लगे। 

मगर ऐसा होता नहीं है कभी 
प्रकृति का पेड़ 
चाहे कितना भी ललचाये 
जो प्रकृति ने उसे नहीं दिया 
वे पैर या पर 
वह पा नहीं सकता 
और प्रकृति के नियम को 
कोई भी झुठला नहीं सकता। 













सामाजिकता



सामाजिकता  के 
आवरण के नीचे 
बड़ी मजबूरियों से सभ्य हुये हम 
मूलतः तो एक पशु ही हैं। 
जो हर पल छटपटाता है और 
इस केंचुली के हटते ही 
बड़ा सुख व सकून पाता है।  

कभी सोचा 
कि ये जंगल ,ये पहाड़ ,ये झरने 
हमे इतना क्यों भाते हैं और 
कैसे -कैसे उनके गुप्त व मौन ईशारों को पाकर 
हम क्यों उनकी और खिंचे चले जाते हैं। 
और क्यों हमारे न चाहते हुए भी,
और  हमारे इन्हें गगनचुम्बी इमारतों के पीछे 
छुपाने के बावजूद भी 
ये  हर रोज हमारे भीतर उभर -घुमड़ आते हैं। 
सामाजिकता की नकली जहरीली सांस 
अपने फेफड़ों में भरते हम 
बार- बार ये क्योँ भूल जाते हैं कि 
बड़ी मजबूरियों से सभ्य हुये हम 
मूलतः तो पशु ही हैं।  








Wednesday, May 20, 2015

माँ की याद में



ओ मेरी माँ 
मुझे बचपने में ही 
इस भीड़ भरे शहर में 
अकेले बेसहारा क्यों छोड़ गई थी ,
जैसे कोई शेरनी छोड़ देती है
शावक को घनघोर बियाबान जंगल में। 
एक लम्बे समय तक, 
इन सड़कों की जगमगाती नियोन लाइटों की शहतीरें 
और दानव की तरह इधर- उधर भागती गाड्यिों की 
रोशनियों की आंख्नो में चुभते किरचें 
दोनों ही मुझे बहुत सताती रहीं 
और  इस भरे पूरे शहर में भी 
मुझे अकेला होने का अहसास कराती रहीं। 
तब मेरा विश्वास भी निरा मेरा वहम निकला कि 
वक़्त व ऊम्र के बीतते - गुजरते मै इस भय से 
अवशय छुटकारा पा लूंगा। 
मगर यह  हो न सका कयोंकि ये तो मेरे जिस्म की चमड़ी से चस्पां हो  चुकी है। 
और अब तो उम्ह्र के इस पड़ाव में कोई शक नहीं रहा अशेष कि मुझे तो इनके साथ ही जीते जाना होगा। 
मगर मैं अपने बच्चोँ को 
उनकी माँ के आंचल में पालकर 
उनको इस दर्दीले अहसास से बचाना चाहते हूँ 
और उनका परिचय (पालन )
एक निर्भय उजले सूर्य  से करवाना चाहता हूँ।