Thursday, April 12, 2018

द्वंद

द्वंद
हर रोज ही
अनेकानेक बातों पर
दिल और दिमाग आपस में लड़ जाता है
जो हारता है वो
सिकुड़ता-सिमटता है और
जो जीतता है वह फूल कर बड़ा हो जाता है
मग़र सही और गलत का निर्णय तो
वक्त भविष्य में करके बताता है
वैसे जब कभी दिल की मानों तो
वह नुकसान करवाता,हँसी उड़वाता और
जूते खिलवाता है और कभी
दिमाग की मान जाओ तो
सभी इंद्रीयां विद्रोह करती और शरीर के द्वारा
काम करने को इंकार करती हैं...
दोनों के सामंजस्य से ही साइकिल चलता है
वरना इंसान टूट फूट कर
गड्डे में जा पड़ता है....।
------ सुरेन्द्र भसीन

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