क्रोध की आँधी
गुजर जाने के बाद
आत्मग्लानि के कीचड़ से भरपूर सना मैं
भीतर से लाख चाहकर भी
किसी को क्षमा
नहीं कर पाता हूँ।
मेरे भीतर की
पुरानी हीनभावनाएँ, कमजोरियाँ, नाकामयाबियां,
विवशताएं और मेरे व्यक्तित्व के काले घने सघन जाले
सभी मेरे आड़े आते हैं,
जो मेरे क्रोध को -
दुगना,तिगुना और चौगुना
करते चले जाते हैं।
मुझे बदला लेने के लिए उकसाते हैं और
मुझे कड़े से कड़ा करके भारी, घना और गुनहगार बनाते हुए
मेरी समस्यायें हीं बढ़ाते है।
और अंतत मुझे चिड़चिड़ा,
रुखा-सूखा, क्षमाविहीन(जो किसी को क्षमा न कर सके) वटवृक्ष बनाकर
अकेला छोड़ जाते हैं।
-------------- सुरेन्द्र भसीन
गुजर जाने के बाद
आत्मग्लानि के कीचड़ से भरपूर सना मैं
भीतर से लाख चाहकर भी
किसी को क्षमा
नहीं कर पाता हूँ।
मेरे भीतर की
पुरानी हीनभावनाएँ, कमजोरियाँ, नाकामयाबियां,
विवशताएं और मेरे व्यक्तित्व के काले घने सघन जाले
सभी मेरे आड़े आते हैं,
जो मेरे क्रोध को -
दुगना,तिगुना और चौगुना
करते चले जाते हैं।
मुझे बदला लेने के लिए उकसाते हैं और
मुझे कड़े से कड़ा करके भारी, घना और गुनहगार बनाते हुए
मेरी समस्यायें हीं बढ़ाते है।
और अंतत मुझे चिड़चिड़ा,
रुखा-सूखा, क्षमाविहीन(जो किसी को क्षमा न कर सके) वटवृक्ष बनाकर
अकेला छोड़ जाते हैं।
-------------- सुरेन्द्र भसीन
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