"एक अदद झूठ"
क्या करूँ
जब-जब मैं कोई
झूठ बोलता हूँ
अपने में बड़ा उखड़-सा जाता हूँ
इसलिए कोई-सा भी बड़ा या छोटा
झूठ बोलते ही
तुरंत पकडा जाता हूँ।
न न उंगली टेढ़ी कर कोई
काम निकाल पाता हूँ
न ही हाथी को चूहा बताने का
कुतर्क लोगों के गले उतार पाता हूँ
और न ही गधे को महान बताकर
उसका गुणगान ही कर पाता हूँ।
रंगा सियार नहीं हूँ मैं
और न गिरगिट की तरह पल-पल रंग ही बदल पाता हूँ।
ऐसे मौके पर अपने में
भीतर तक बनावटी और खोखला
हो जाता हूँ।
लोग कहते हैँ -
बहुत सीधा हूँ मैं
चूंकि सब ईशारे समझता हूँ मैं
इसलिए किसी को तो कहता कुछ नहीं
मगर अपने पीछे छुपता और सिमटता ही जाता हूँ,
सच कहने की
चाहे हर सजा पाता हूँ
जीवन रेखा के बाहर निराश भी बैठा मैं
अपनों से भी लाख धोखे खाता हूँ
मगर अभी भी
सुधरा नहीं हूँ मैं
और न सुधरना ही चाहता हूँ।
क्योंकि लाख प्रयास करके भी मैं
एक सफल
झूठ नहीं बोल पाता हूँ।
------ सुरेन्द्र भसीन
क्या करूँ
जब-जब मैं कोई
झूठ बोलता हूँ
अपने में बड़ा उखड़-सा जाता हूँ
इसलिए कोई-सा भी बड़ा या छोटा
झूठ बोलते ही
तुरंत पकडा जाता हूँ।
न न उंगली टेढ़ी कर कोई
काम निकाल पाता हूँ
न ही हाथी को चूहा बताने का
कुतर्क लोगों के गले उतार पाता हूँ
और न ही गधे को महान बताकर
उसका गुणगान ही कर पाता हूँ।
रंगा सियार नहीं हूँ मैं
और न गिरगिट की तरह पल-पल रंग ही बदल पाता हूँ।
ऐसे मौके पर अपने में
भीतर तक बनावटी और खोखला
हो जाता हूँ।
लोग कहते हैँ -
बहुत सीधा हूँ मैं
चूंकि सब ईशारे समझता हूँ मैं
इसलिए किसी को तो कहता कुछ नहीं
मगर अपने पीछे छुपता और सिमटता ही जाता हूँ,
सच कहने की
चाहे हर सजा पाता हूँ
जीवन रेखा के बाहर निराश भी बैठा मैं
अपनों से भी लाख धोखे खाता हूँ
मगर अभी भी
सुधरा नहीं हूँ मैं
और न सुधरना ही चाहता हूँ।
क्योंकि लाख प्रयास करके भी मैं
एक सफल
झूठ नहीं बोल पाता हूँ।
------ सुरेन्द्र भसीन
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