Monday, October 19, 2015

चुप्पी 

जब धूप 
तीलियों-से अपने किनारे तोड़ रही थी 
और तुम चुप्पी में भी बहुत कुछ बोल रही थी। 
बांट रही थी अपनी चुप्पी 
चुप रहकर भी
चुप्पी में ही चीखते हुए।

तब चुप्पी के इस भयंकर शोर में 
मैं बहुत कुछ बोल गया था
अपना सब कुछ खोल गया था  
चुप रहकर भी। 
जिसको खोलकर मैं
खोल देखता रह गया था उसका
साहचर्य!
क्योंकि अपनी भावनाएं हीं
हैरान कर गईं थीं मुझको।
भटक गया था कुछ पल के लिए
अपनी खोल भावनाओं के जंगल में।
लेकिन तुमने
उसे मेरी नियति मानकर ही
अंगीकार कर लिया था साधिकार!
मौन बढ़ावा ही दिया था
उस दिन तुमने मुझको
और मैं
काफी समय तक
मात्र जंगल होकर रह गया था।
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बोलती चुप्पी

 याद है तुम्हें
वह निराली सुरमई शाम 
जब लिखा था तुमने 
मेरे दिल में अपना नाम !)
और मैं चुप 
देखता भर रहा था तुम्हारी इन सुनहरी सपनीली आँखों में 
लेकिन तुम
लगातार लिखती ही गईं थीं
दिल की इबारत आँखों से
 करती ही रही थीं
अपनी पहचान के घाव गहरे अपने भावों से। 
उस दिन 
मेरी चुप्पी चीख रही थी  
खोना चाहती थी 
तुम्हारी आँखों से 
दिल की अतल गहराइयों में ।
और आज
जब तुम मेरे सामने हो
मैं गहरे घावों को सहलाता
बोलना चाहता हूँ अविराम।
लेकिन
 लाख प्रयत्नों से भी बोल नहीं पाता हूँ।

खोल नहीं पाता हूँ 
 टांके गहरे घावों के। 
न जाने कैसे?
तुम उस दिन बोल गईं थी
सब कुछ
चुप रहकर भी...
लेकिन आज
लाचार, टूटा मैं
बोल नहीं पाता हूँ।
न जाने क्यों
मुख के जूठे शब्दों से
पवित्र कानों की दूरी पाट नहीं पाता हूँ!
बसमैं तो तुमसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि
 लाख बोलना चाहकर भी 
मैं कुछ बोल नहीं पाता हूँ। 
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लेकिन

उस दिन
तुम दूर दूर तक
नजरों को दौड़ाकर भी
ढूंढ न पायी थी मुझको...
चीख चीख कर भी
कह न पायी थी कुछ भी 
मुझको।

उस दिन भी मैं
तुम्हारे दिल के किसी कोने में पड़ा
दम तोड़ रहा था सिसकियों भरा।

आज जब
तुम मुझसे कितनी दूर हो
बहुत बहुत दूर...
लेकिन मैं तुम्हें
अपने कितने करीब पाता हूँ।
दिल की भाषा बोलकर भी
अपनी बात तुम तक पहुंचा पाता हूँ।

फ़र्क केवल इतना है कि
जब भी तुम टटोलती थी अपने मन को
बहुत परे पाती थी तुम मुझको।
जबकि मैं
तुम्हें ही अपना मानकर
दिल के साथ लगाता हूँ।
इसलिए ही
कुछ न बोलकर भी मैं
बहुत कुछ बोल जाता हूँ।
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यह कैसी चुप्पी

कुछ कहो
तुम्हारा कहना अच्छा लगता है
और चुप रहना भयावह!
माना कि जब बोलना व्यर्थ हो
तो चुप रहना ही बेहतर है।
लेकिन स्थितियाँ ऐसीं तो नहीं कि
तुम चुप रहो और
काम हो जाये...

जरा सोचो तो
भूखे की भूख
और सूरज की धूप
एक सी ही होती है।
फिर चाहे सूरज भूख हो या
भूखा हो सूरज
सब बराबर ही तो है...

कहीं तुम्हारा न बोलना
इन चीखों की वजह तो नहीं...

अरे!
तुम अब नहीं बोले
ह्रदय के पट तुमने नहीं खोले...

अब तुम्हारा प्यार
मात्र चुप्पी तो नहीं
जो मुझे सहला-सहला कर
मार डालना चाहती हो !
समय की धधकती आग में
गला डालना चाहती हो...

उफ !
काल तक काटे हैं मैंने
पर यह कैसी चुप्पी
क्षण तक भारी पड़ रहा है....

नदी के बहते
तुम प्यासे हो
आँच के रहते
तुममें जलन नहीं
चीख का कारण रहते भी
तुम्हारी जिव्हा में स्पंदन क्यों नहीं?
कहीं तुम गूँगे तो नहीं?
अंदर से बहता लावा तो नहीं हो तुम?
जो जमा नहीं
और तुम आज
सदा के लिए चुप्पी में
खो गयी हो,
सो गयी हो,
सदा-सदा के लिए।
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Sunday, October 18, 2015

घर

छोड़ दो  
अपनी इन व्यापारिक मजबूरियों को 
और अपने घर पर भी एक कविता लिखो। 
तुम 
घर से निकलते ही 
घर के विचारों को 
कुर्ते पर पड़ी धूल की तरह झाड़ देते हो 
और अपनी कविता बनाम तलवार 
जिस-तिस पर तान देते हो। 

कभी,
इस तलवार को अपने पर भी तानों 
और इस घर की अव्यवस्था कहीं तुम्हारी भी है 
इस सत्य को जानो। 
तुम जो यह तारकोली अँधेरा अपने घर भर में भरते जा रहे हो 
यह सोच कर तुम अपने बच्चों के लिये घर भर उजाला कमा रहे हो। 

नहीं तो सोचो
कहाँ से आया है इस घर में यह अंधेरा। 
इसे बाहर से तुम्ही तो लाये थे अपने साथ। 

और अब यही तारकोली अँधेरा,
जो तुम्हारी उँगलियों के पोरों से बच्चों में उतर गया है,
मानो पहाड़ से होता हुआ समूची घाटी में पसर गया है, 
नागफ़नियों की तरह तुम्हें और  बच्चों को ग्रस रहा है, 
इससे अब तुम 
हम-सबको बचा लो 
और जीवन के लिये नया उजाला कमा लो। 












अपना भय

भय 

हार जाता हूँ मैं 
मैं हार जाता हूँ 
अपने ही भय से।  


पिटा हूँ कई बार 
उन्ही हाथों से
जिन हाथों ने भीरु बनाया था मुझे
वैसे मेरी अपनी ही कमजोरी 
तोड़ती है मेरे मन को
मेरे तन को। 
कई बार सब छोड़-छाड़ कर भाग जाना चाहता हूँ 
मगर चाहकर भी 
यह कर नहीं पाता हूँ 
क्योंकि 
हार जाता हूँ मैं,
मैं 
हार जाता हूँ अपने ही भय से। 

प्रतिशोध

वे उसके चश्में के नहीं 
आँखों के लैंस थे 
जो तुमने फोड़ दिये 
इस घिनौनी साजिश के साथ 
कि कहीं तुम्हारी दी यातनाओं के अक्स 
उसके बच्चों में न उतर जाएँ प्रतिशोध बन। 

मगर जाओ और जा कर देखो 
कि सदियों से सुप्त पड़ा क्रांति बीज 
उसके रक्त से सिंचित हो 
एक रक्तिम गुलाब बन चुका है 
तुम्हारे वजूद को धिक्कारता। 

Saturday, October 17, 2015

अहसास


ये जो
सारी की सारी वस्तुएँ हैं न 
हमारा मन, हमारी इच्छायें पढ़-पढ़ कर 
वैसे ही करतीं हैं हमसे व्यवहार 
जैसे हमारे तन-मन की अवस्था बदलती 
जाती है बार-बार। 
जहाँ क्रोध में वो कुछ ज्यादा ही अटकती हैं तो 
खुशी में उलहसकर ज्यादा ही मटकती हैं।

ये दरवाजे, ये बर्तन, ये कपड़े, ये जूते,
ये मेज-कुर्सी, स्कूटर-कार या फिर ऑफिस का सामान 
सब का सब हम पर हॅंसता है और व्यंग्य करता लगता भी है,
वक़्त आने पर अपनी पूरी जगह मांगता और न पाने पर 
हमसे लड़ता भी है। 
चोट खाने पर बुरी तरह ऐसे चिहुँकता जैसे 
किसी ने कुत्ते की दुम पर पाँव रख दिया हो याकि 
पेड़ से नारियल तोड़ कर गिराया हो जैसे।   

कैसे-कैसे
विरोध,क्रोध,विरह,प्रेम, काम, आह बेजान वस्तुओँ में उतर आता है 
नहीं !  वस्तुओँ में 
हमारे वक़्त का प्रतिबिंब ही बस जाता है। 













Wednesday, October 14, 2015

गांधीजी के सहारे


गांधीजी ने कब कहा था ?
कि मेरा नाम नोटों पर छापो और 
मेरे नाम पर रिश्वत की चाँदी काटो या 
मेरे नाम पर देश और कौम को बाँटो। 
पर तुम्हें तो, 
ये सब कुकर्म किसी बड़े नाम की आड़ में करना ही था, जैसे  
अदालत में तुम धर्मग्रंथों की कसमें खाते हो 
और हुजूर-हुजूर करके बेशर्मी से झूठ बोलते जाते हो। 

तुम कितने गुनाह, कितने दुष्कर्म 
अपने धर्मग्रंथों की ओट में छुपाना चाहते हो 
मगर मौका मिलते ही फिर-फिर करते भी जाते हो। 

तुम चाहो या न चाहो 
ये पाप भी तुम्हारी नजायज संतान ही हैं जो 
पीछा करते एक न एक दिन 
तुम्हारे ही मुँह पर आयेंगे 
-और तुम्हारी आत्मा को कोचेंगे  
तुम्हारी ही देह चबायेंगे ।  

Friday, October 9, 2015

जरूरी बात

रामायण,महाभारत या 
सत्यवादी राजा हरीशचंद्र की कथायें पढ़ते जाने से 
उनके तजुर्बे अब कभी 
सीधे तुम्हारे जीवन में काम नहीं आते 
वे कथायें कभी चित्र थीं 
अब महज रीतता रेंखाकन मात्र रह गयीं हैं 
इसलिये दूसरों के तजुर्बों को न जमा करो 
अपने  तजुर्बे के वटवृक्ष को 
अपने ही वक़्त और रक्त से सींच कर बड़ा करो

वैसे भी गाड़ी में किसी के पीछे बैठ जाने से 
रास्ते कट तो जाते हैं 
पर याद नहीं रह पाते, अपने नहीं हो जाते।  
और जीवन में उधारी के या चुराये हुए तजुर्बे
कभी मंजिल तक नहीं पहुंचा पाते 
वक़्त आने पर तुम्हें 
प्रश्नों के चौराहे पर या जंगल बियांबन में छोड़ जाते हैं। 

रंग-बिरंगे पक्षी


जैसे 
रंग-बिरंगे पक्षी 
न जाने कहाँ-कहाँ से 
आ बैठते हैं घर की, छतों की मुंडेरों पर 
ख्याल और सपने भी 
अपने आप ही उतर जाते हैं हममें 
जीवन का हिस्सा बन जाने को। 
और मंत्रमुग्ध-सा उसके पीछे हो लेता है 
जीवन स्वर्णमृग पाने को।  
नई लिप्सा में लिपटा-चिपटा 
आत्मा को भटकाने को 
जिज्ञासा का मूल्य 
जीवन से चुकाने को।