Friday, February 15, 2019

    'ऋत अभी शेष है' कवि बलदेव वंशी की याद

2फरवरी2019 सायं 6 बजे हिंदीभवन में, हिन्दी के साहित्यकार व कवि बलदेव वंशी की याद में उनके सुपुत्रों वीरेंद्र,सुरेंद्र एवं 'व्यंग्य यात्रा' संगठन ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें उनपर चर्चा करते हुए उनके नये कविता संग्रह 'ऋत अभी शेष है' का लोकार्पण भी किया गया।
कार्यक्रम में अनेक विद्वानों सर्वश्री बालस्वरूप राही, प्रेमजनमजेय,लालित्य ललित,हरीश नवल,सुधेन्दु ओझा,गोबिंदव्यास, हरिपाल आदि ने भाग लिया और वंशी जी के हिंदी साहित्य में किए महत्वपूर्ण योगदान को याद किया, सराहा।
        इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हरीशनवल जी ने 'ऋत' शब्द के अर्थ व महत्व पर प्रकाश डाला एवं वंशी जी को बहुआयामी व्यक्तित्व का स्वामी बताते हुए आधुनिक समय का कबीर व शिक्षा शास्त्री बताया। हिंदीभवन के अध्यक्ष     श्री गोविंद व्यास जी ने कहा कि वे वंशी जी के संत संबंधी ज्ञान से अत्यंत प्रभावित थे और उनके ऋणी हैं। उन्होंने आभार व्यक्त किया कि वंशी जी ने सदा उनका मान रख कर उन्हें समय दिया। व्यासजी ने हिंदीभवन पुस्तकालय में वंशी जी की पुस्तकों को अलग विशिष्ट स्थान देने का प्रस्ताव भी रखा। (यहां गौरतलब है कि वंशी उजी की पुस्तकों का संसार 200 से भी अधिक पुस्तकों का है) इसी कार्यक्रम में डॉ उमाशशि दुर्गा ने डॉ वंशी के जीवन पर बोलते हुए, सन्त साहित्य में उनके योगदान पर एक आलेख भी पढा। व्यंग्ययात्रा के सम्पादक प्रेमजनमजेय ने जिन्होंने पुस्तक की भूमिका भी लिखी है ने डॉ वंशी की रचनाओं में व्यंग्य की चर्चा की और उन्हें उम्दा फल वाला वक्ष  प्रतिपादित किया जैसाकि वह पुस्तक की भूमिका में लिख ही चुके हैं। यहीं 'लोकायता' पत्रिका के सम्पादक बलराम ने वंशी जी के फक्कड़ व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनकी सरलता व सहजता की बात की और कहा कि कैसे वह बड़े ही साधारण तरीके से, सहजता से उनसे मिलने फरीदाबाद से उनके घर आ जाया करते थे। ऐसा ही अपना अनुभव बेनीकृष्ण जी ने भी वंशी जी के लिए बताया। बालस्वरूप राही जी ने भी कहा कि जहां आज के कवि दूसरे कवि की चर्चा व सहायता नहीं करते वहीं वंशी जी ने उनकी पत्नी को कविता लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और उनका मार्गदर्शन किया। इसी मंच पर  सुधेन्दु जी ,सुपुत्र वीरेंद्र, सुरेंद्र एवं अन्य लोगों ने भी अपने विचार प्रकट किए व वंशी जी को बड़े मन से याद किया।
      इस कार्यक्रम में उनके जिस कविता संग्रह 'ऋत अभी शेष है' का लोकार्पण हुआ में कवि वंशी की लगभग 130 कविताएँ संकलित हैं जोकि 196 पृष्ठों में समेटी गई हैं। उनकी अधिकतर कविताएँ उनके अंतिम समय के महीनों की हैं जिनमें कवि की उस समय की मनस्थिति का पता चलता है कि वह किस सोच, अहसास से गुज़र रहा है। वह एक सीमा रेखा पर है जहां एक ओर भौतिकता पीछे है तो आगे रहस्य...। इस कविता संग्रह में अनेक कविताएँ राजनैतिक,सामाजिक विरोधों व छटपटाहटों वाली भी हैं। इस कविता पुस्तक का मूल्य 300 रुपए मात्र है जो सजिल्द में काफी किफायती बन पड़ी है।
             ---------             सुरेन्द्र भसीन



Friday, February 1, 2019

सैनिक

सैनिक

किसी भी
पेड़ पर फल-फूल आने से
वह बड़ा खुश हो जाता है
फूला नहीं समाता है....

मग़र क्या एक भी फल
वह कभी खुद खाता है...

नहीं, सभी कुछ स्वयं
धरती माँ पर लौटाकर,गिराकर ही
पूरा हो जाता है।
                    - (26जनवरी पर विशेष)
      -----    सुरेन्द्र भसीन

Wednesday, January 23, 2019

वर्चस्व

पद का रौब बताकर
बाहुबल दिखाकर या
पैसे की अकड़ जमाकर या
किसी भी अन्य तरीके से
जब भी तुम अपने को
सबसे बड़ा बताने का प्रयास कर रहे होते हो
तो तब तुम एक छोटे बच्चे से भी
छोटे दिखने लग जाते हो...
जो बचपने में अपने साथियों को
अपनी पॉकेटमनी दिखाकर या
ऊँची टेकली पर चढ़कर या
अपनी नयी नकली पटाखे वाली
पिस्तौल दिखाकर चिढ़ाता है और
अपने को दूसरों से बड़ा बताने का
सुख पाना चाहता है...
बच्चा तो नहीं
किंतू तुम तो भीतर ही भीतर
यह जानते ही हो न कि
यह सब क्षणिक है,
इसमें कुछ स्थायी नहीं
और तुम्हें कभी भी
फिर इन्हीं में ही लौट के आना है
इन जैसा
हो जाना है...
       -----     सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, January 22, 2019

समझदारी

रोटी ही
बड़ी होती है पृथ्वी नहीं
यह मैंने तब जाना
जब मैंने अपनी अन्तड़ियों में
और लोगों की नीयत में पैठी
भूख को पहचाना
रोटी की ज़रूरत को जाना...
रोटी की चाह
जो निगल जाती है-
पहाड़ के पहाड़,
जंगल के जंगल,
बाग-बागान,खेत-खलिहान,
धरती के खनिज, फैक्ट्री की फैक्टरियाँ..
इज्जत,ईमान धर्म और ईश्वर भी
मग़र वैसी की वैसी ही
बनी रहती है सदियों पुरानी
जैसे कि थी...
घूमती...घुमाती
मग़र न टस...न मस...
बिल्कुल ठस!
       -----   सुरेन्द्र भसीन

Monday, January 21, 2019

आदरणीय मैडम जी,
     जैसा कि सर्वविदित है कि हिंदी साहित्य की कविता विधा में डॉ बलदेव वंशी एक जाना माना नाम है। उनके किये गए आधुनिक कविता, विचार कविता में व सन्त साहित्य में खोजपरक कार्यों को हर कोई  मानता और सराहता रहा है, इसलिए उन्हें राष्ट्रपति पृरस्कार से भी नवाजा गया था।
         7जनवरी 2018 को उनका स्वर्गवास हुआ और एक वर्ष उपरांत हमनें(उनके दोनों सपुत्रों) ने उनकी सभी
अप्रकाशित कविताओं का एक संकलन 'ऋत अभी शेष है' नाम से प्रकाशित किया है जिसकी भूमिका  प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री प्रेमजन्मजेय जी ने लिखी है,का विमोचन 2फरवरी 2019 सांय 5.0बजे हिंदी भवन में होना तय हुआ है। अतः आपसे नम्र निवेदन है कि आप इस कार्यक्रम को दूरदर्शन के श्रोताओं को भी उपलब्ध करा कर हमें भी अनुगृहित करें जैसाकि आपने उनके पूर्व के कार्यक्रमों को प्रसारित कर हमें उपकृत किया था।
   धन्यवाद!
भवदीय
वीरेन्द्र भसीन एवं सुरेन्द्र भसीन
9811037758 & 9899034323
सुपुत्र डॉ बलदेव वंशी

Sunday, January 20, 2019

इस पृथ्वी के
हजारों किलोमीटर ऊपर तो
कहीं चाँद है।
लाखों किलोमीटर ऊपर है सूर्य,
करोड़ों किलोमीटर ऊपर,
दूर तारों का समूह...
उसमें भी कोई आख़री तारा भी होगा ही
और उसके बाद...
और...और...कुछ और...
जानते हैं हम
मानते हैं हम तो
यही तो ईश्वर है
यही ईश्वर का
रूप स्वरूप
....और क्या?
      -----  सुरेन्द्र भसीन

Thursday, January 17, 2019

       दिवंगत कवि श्री बलदेव वंशी को
       श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके
       नवीन कविता संग्रह -
       "ऋत अभी शेष है" का विमोचन
        श्री....................के द्वारा
        2फरवरी,2019, शाम 5.00 बजे
                 हिंदी भवन में

संयोजक........