Tuesday, January 22, 2019

समझदारी

रोटी ही
बड़ी होती है पृथ्वी नहीं
यह मैंने तब जाना
जब मैंने अपनी अन्तड़ियों में
और लोगों की नीयत में पैठी
भूख को पहचाना
रोटी की ज़रूरत को जाना...
रोटी की चाह
जो निगल जाती है-
पहाड़ के पहाड़,
जंगल के जंगल,
बाग-बागान,खेत-खलिहान,
धरती के खनिज, फैक्ट्री की फैक्टरियाँ..
इज्जत,ईमान धर्म और ईश्वर भी
मग़र वैसी की वैसी ही
बनी रहती है सदियों पुरानी
जैसे कि थी...
घूमती...घुमाती
मग़र न टस...न मस...
बिल्कुल ठस!
       -----   सुरेन्द्र भसीन

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