Monday, February 26, 2018

हालात

हालात
अपनी
सारी कविताओं को
पढ़ो और देखो
क्या इसमें से कोई एक कविता भी
पड़ोसी या श्रोता के साथ
उसके घर जाती है, या
उसके दिल में घर कर जाती है?
माना कि
तुम्हारी सारी की सारी कवितायें
उसको या उसके बारे में ही
कुछ कहती हैं, मगर
क्या कोई उसके
जीवन में कभी रहती है या
उसे याद रहती है?
तुम दूर टीले पर बैठे
एक ढ़ोंगी बाबा-से
इंतजार में हो कि
कोई पहाड़ी चढ़कर आये,
तुम्हें मान दे, तुम्हें पूजे
और प्रार्थना करके
प्रसाद स्वरूप तुम्हारी कविता ले जाये
ताबीज बनाकर पहने और
तुम्हारे सदियों गुण गाये....
मगर तुम यह तय नहीं करते हो
कि तुम्हारी कविता उसके
दुख दर्द में काम आये
उसके सिरहाने भी बैठे और कभी उसके
बगलगीर भी हो जाये।
तुम्हारी कविता में
अब मिठास नहीं है और
उसमें ईश्वर का वास नहीं है
निरा स्वार्थ ही लपलपाता है इसलिए
अब तुम्हें कोई सुनना-पढ़ना नहीं चाहता है और
तुमसे और तुम्हारी कविता से मुँह फेर
पराया हो निकल जाता है।
------- सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, February 20, 2018

नानी नदी.…

नानी नदी.…

नाना नहर
और नानी नदी
दोनों ही
एक दूजे के समानन्तर बहते हैं
और उनके बीच बनी
हरित भूमि पर
हम सब मिलकर
पौधों की तरह ही रहते हैं...
यूँ तो
नाना नहर और नानी नदी
बीच बीच में मिला करते हैं...
और न जाने क्या-क्या
बातें कहा-किया करते हैं...
और हम भी
जब चाहे उनसे
प्रेम जल लिया करते हैं...
ऐसे ही
सभी के नाना नानी
सब के दिल में
सदा बहा करते हैं...।
------- सुरेन्द्र भसीन

Tuesday, January 2, 2018

हाँ को न

ज्यादा मीठा बोलने
पर भी
इर्द-गिर्द सिर्फ
कीड़े-मकोड़े ही जमा हो जाते हैं
जो काटते हैं, कौंचते हैं
चाटते हैं और फिर एक दिन
चट ही कर जाते हैं।
क्या आप ऐसा चाहते हैं?
अगर आप अपने लिए
अपने आपको बचाना चाहते हैं तो
जीवन में कभी-कभी
न कहना भी सीख जाईये।
मानो न मानो
न कहने से भी
आपकी हाँ का प्रभाव बढ़ता है
नहीं तो
आपकी हाँ से भी
आपके ढुलमुल रवैया का ही पता चलता है।
इसलिए अगर
चाहते हैं महत्व पाना तो
आपको कभी-कभी न भी
करनी चाहिए।
      -------     सुरेन्द्र भसीन

Wednesday, December 27, 2017

सच का भूत

सुबह
सच ने कहा कि
आज मैं तुम पर आया हूँ
सारा दिन तुममें ही रहूंगा
और आज तुम वही बोलोगे
जो मैं तुमसे कहूँगा....

अब सच तो पुरानी ऐतिहासिक वस्तु है
आजकल के आधुनिक युग में सच कौन कहता है
सच तो आजकल किताबों में रहे यही अच्छा रहता है  ....
अब सोचो
मैं सच किसे कहूंगा -
बीवी को, पड़ोसी को या बॉस को ?           
और इन्हें सच कहकर क्या मैं
जाकर किसी जंगल या पहाड़ पर रहूंगा ?
चलो मैं तो कह भी दूँ
मगर क्या वह सह लेंगे -
कि पत्नी तुम सुंदर नहीं हो,
कि पड़ोसी तुम कमीने और जल्लाद हो,
कि मालिक तुम  मुझ निरीह बेजुबान पक्षी को
अपनी नौकरी में फंसाने वाले
काले-कलूटे कंजूस सय्याद हो.....!
हे सच!
तुम तो जीवन में
मुझपर एक दिन ही आओगे
मगर सदियों के लिए मेरा
बेड़ा गर्क कर जाओगे।
अच्छा हो,
तुम मुझ गरीब को न सताओ
और जहां से चले थे
वहीं लौट जाओ !
       --------- सुरेन्द्र भसीन


नफा-नुकसान ग़ज़ल

न नफा हुआ न नुकसान हुआ
बस हमारी वफ़ा का इम्तहान हुआ।
न हम हारे न जमाना जीता 
बस अपनी हैसियत का गुमान हुआ।
न जंगल कटा न बस्तियाँ बसीं
बस इलाका ही वीरान हुआ।
न नफरत घटी न मोहब्बत बड़ी
बस हसरतों का ही नुकसान हुआ।
चुप रहकर जो हमें रुसवा न किया
बस हम पर बड़ा अहसान हुआ।
----- सुरेन्द्र भसीन    

नालायक फल

नालायक फल 

वृक्ष पर डाल से 
लगा हुआ एक नालायक फल 
बड़ा कसमसा रहा था 
पकने से पहले 
डाल से छूटकर  
धरती पर आना चाह रहा था 
ऊपर से धरती की रौनक,
चहल-पहल उसे भरमाती थी,
धरती की भाग-दौड़, चकाचौंध उसे आकर्षित करती ही जाती थी। 
वह बार-बार ईश्वर से 
जल्दी नीचे भेजने की जिद करता और 
भगवान उसे समझाते कि 
अभी तुम बच्चे और कच्चे हो 
नीचे गिरने की चोट तुम 
सह न पाओगे 
गिरते ही, दाना-दाना होकर टूट-बिखर जाओगे
तनिक सब्र करो 
रूप अपना संवरने दो
देह अपनी पकने दो। 
एक दिन स्वयं माली आयेगा 
तुम्हें डाल से तोड़ेगा, 
पोंछेगा, पुचकारेगा 
डलिया में रखकर ले जायेगा ,
लारी में घुमायेगा,
बाजार में रेहड़ी पर टहलायेगा,
प्यार से कोई गृहणी के संग किसी के घर जाओगे,
परिवार तुम्हें बांटेगा, खायेगा 
और यूँ तुम्हारा जीवन पूरा हो जायेगा। 
मगर उसकी तड़प और बेचैनी देखकर 
भगवान ने उसे वक़्त से पहले 
नीचे टपका दिया 
धड़ाम से गिरते ही चोट लगी 
शरीर पर जख्म और गुमड़ आ गया 
हिलडुल न सका,
पत्ते, मिट्टी, पत्थर उसपर लगातार पड़ने लगे 
कीचड़ में वह सनता गया 
और फिर एक दिन सड़ गल के 
किसी जानवर के पाँव के नीचे आ गया। 
कुछ न मिला 
भ्र्रमित था वह 
भ्र्रम -सा जीवन पा गया।  
          -------- सुरेन्द्र भसीन 
















Wednesday, December 20, 2017

"प्रश्नों का सवाल"

प्रश्नों से, सवालों से
हम सदा चिंहुककर भागते हैं
हम कभी
उनके भीतर, उनकी तली में
नहीं झाँकते हैं
जबकि प्रश्नों के,सवालों के
केंद्र में, ठीक बीच में ही
उत्तर पड़े होते हैं-
सुलझने को/खिलने को आतुर...
मगर हमेशा हम
बाहर -बाहर, दूर-दूर भागते हैं
और प्रश्नों को
अपना दुश्मन, ऊँची दीवार ही आंकते हैं....
जबकि प्रश्न राह बनाते/दिखाते हैं
सच मानों
तो वही दिशा संकेत/निर्देश हैं
जो हमें मंजिल का
पता बताते हैं।
  --------     सुरेन्द्र भसीन