"प्रश्नों का सवाल"
प्रश्नों से, सवालों से
हम सदा चिंहुककर भागते हैं
हम कभी
उनके भीतर, उनकी तली में
नहीं झाँकते हैं
जबकि प्रश्नों के,सवालों के
केंद्र में, ठीक बीच में ही
उत्तर पड़े होते हैं-
सुलझने को/खिलने को आतुर...
मगर हमेशा हम
बाहर -बाहर, दूर-दूर भागते हैं
और प्रश्नों को
अपना दुश्मन, ऊँची दीवार ही आंकते हैं....
जबकि प्रश्न राह बनाते/दिखाते हैं
सच मानों
तो वही दिशा संकेत/निर्देश हैं
जो हमें मंजिल का
पता बताते हैं।
-------- सुरेन्द्र भसीन
प्रश्नों से, सवालों से
हम सदा चिंहुककर भागते हैं
हम कभी
उनके भीतर, उनकी तली में
नहीं झाँकते हैं
जबकि प्रश्नों के,सवालों के
केंद्र में, ठीक बीच में ही
उत्तर पड़े होते हैं-
सुलझने को/खिलने को आतुर...
मगर हमेशा हम
बाहर -बाहर, दूर-दूर भागते हैं
और प्रश्नों को
अपना दुश्मन, ऊँची दीवार ही आंकते हैं....
जबकि प्रश्न राह बनाते/दिखाते हैं
सच मानों
तो वही दिशा संकेत/निर्देश हैं
जो हमें मंजिल का
पता बताते हैं।
-------- सुरेन्द्र भसीन
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