Thursday, October 4, 2018

अपना /अपनों से युद्ध

कैसा?
कैसा लगता है
अपने ही घर में
अपनों से युद्ध लड़ते हुए?
हार-जीत का
फैंसला करते हुए?
महाभारत के किसी खलनायक में ढलते हुए...
ये तेरा, ये मेरा करते हुए
अपने अहं की वजह से
अपने ही घर मे
अपने वजूद को सिद्ध करने का
प्रयत्न करते हुए...?
प्रेम,लगाव या स्नेह तो मानों
कहीं वाष्पित ही हो जाता है तब
नज़र में केवल
मैं, मेरा औऱ मुझको ही भर जाता है तब...
कठोर पत्थर पर चोट पड़े तो वह भी
टूट-फूट जाता है मग़र
अहं तो चमकते हीरे का बना है
अपनी चमक, अपने दाम
सभी को  तब जरूर दिखलाता है और
किसी भी भारी भरकम प्रहार से भी
टूट नहीं पाता है...
         .......       सुरेन्द्र भसीन          

संजीवनी

(अंधेरे में, घोर निराशा में, अंधेरे में चमकती संजीवनी बूटी,एक आशा का प्रतीक है को हनुमान जी श्री राम जी की सेना, सत्य की विजय के लिए तब लाए जब श्री लक्ष्मण जी(युवावर्ग) मूर्षा में था)

जब
अंधेरा घेरता है सब दिशाओं से
तब भीतर से आता है शक्ति का हनुमान
चमकती संजीवनी बूटी ले...
तोड़ता है मूर्छा।
जगाता है आस-उल्हास
और मनरूपी राम
फिर उद्यम में लग जाता है
काले रावण को हराने,
अपनी कामना, इच्छा की
सीता को पाने।
         ------  सुरेन्द्र भसीन

बढ़ना

बढ़ना
तो सभी को है
आगे ही आगे
अपनी-अपनी चाहत लिए
उम्मीद के वरक्ष पर
लताओं-सा लिपटकर
याकि तरक्की के रास्तों पर
एक-दूजे को धकियाते-धकेलते
एक-दूजे पर पांव रख-रखकर,
प्रतियोगिता व द्वंद युद्ध-सा करते- कराते...
ज़माना अभावों का है
एक-एक उम्मीद व्रक्ष पर
अनगिनत लताएं हैं चिपटीं
घुन को भी मात देतीं...
कौन जाने किसको?क्या चाहिए?
याकि किसको? क्या-क्या नहीं चाहिए।
सब
उम्मीद के व्रक्ष पर
लताओं से लिपटे हैं
बढ़ते-चढ़ते
एक-दूजे से आगे बढ़ने की,
अधिक पाने की होड़ हैं
करते!...
          ------        सुरेन्द्र भसीन

Wednesday, September 19, 2018

पाती

पाती

सब कुछ तो
कह नहीं दिया है मैंने
काफी कुछ
मिलने पर ही कह पाऊँगा...
तुम्हारे हाँ.. न..के स्वर-अनुस्वर और
आते-जाते चेहरे के भावों से
अपनी बातों का प्रभाव
अगर मैं समझ पाऊँगा तो
बाकी हाल-चाल भी बतिया पाऊंगा...
वक्त निकालकर मिलने आ जाओ
फोन पर ही सब दुख-सुख न समझा पाऊंगा...
अपने गाँव को कैसा शहरी रोग लगा है यह
थोड़े में कैसे समझाऊँगा?
अब बाकी जो कुछ बचा है मन में
सामने ही कह पाऊँगा...
उम्र भी नहीं बचा है कुछ ज्यादा
सुन लो!
वरना मैं यह बोझ अपने
साथ ही लेता जाऊँगा...
                  चला जाऊँगा।
        ---------     सुरेन्द्र भसीन

Thursday, August 23, 2018

नींद

पहले जबरदस्त
और अब जबरदस्ती ही आती है नींद,
घण्टों बिस्तर पर पड़े रहो
शुरू होती ही नहीं है
नींद की मशीन।
लोग कहते हैं यह
खराब हो गई है मगर
मैं इसमें दिन भर की थकान मिलाऊँ तो
यह काम करने लग जाती है।
फिर बिस्तर पर पड़ते ही
झट नींद आ जाती है।
       ------  सुरेन्द्र भसीन

ज़िब्ह

पड़ोसी के
घर बंधे बकरे को नहीं
पर मुझे तो
यह मालूम है कि
कल बकरीद है, इसलिए
बकरे की मैं... मैं पर
मैं बड़ा छटपटाता हूँ
और उसके
कल एक बार जिबह होने से पहले
खुद आज
कई-कई बार
क़त्ल हुआ जाता हूँ...
       ----- सुरेन्द्र भसीन             

Wednesday, August 1, 2018

हिसाब

हिसाब

दो रोटी सुबह
दो दोपहर और
दो रोटी रात
प्याज के साथ खाकर ही
गरीब-मजदूर का जीवन चल जाता है।
मगर संसार का हर पूंजीपति
इसी हिसाब में मरा जाता है कि
गरीब इतनी रोटी भी
क्यों और कैसे खाता है?
       -----    सुरेन्द्र भसीन