Tuesday, October 24, 2017

....फिर एक दिन

पहले भी  कभी
हम सभी थे यहीं
इस शून्य में ,वातावरण में
बस नजर नहीं आते थे.... 
देख पाते थे सभी  कुछ
बोल या उसमें शामिल नहीं हो पाते थे... 
फिर हमारा जन्म हुआ
हम वजूद में आए,
खाने लगे, गाने लगे
चलने लगे , बतियाने लगे ...
अब फिर होगा कभी
एक दिन
हम इस महाशून्य में घुल जाएंगे
विचरेंगे यहीं कहीं
देखेंगे सब कुछ
मगर कह नहीं पाएंगे ...
तो क्या ?
          ---------          सुरेन्द्र भसीन 

वक़्त एक आईना

गीता, बाइबिल, कुरान  या गुरुग्रंथ 
बड़े से बड़ा बम बनाने के फार्मूले के पन्ने (सोच )
एक न एक दिन 
पुराने पड़ जाएंगे 
कूड़े के ढेर में 
पड़े पाए जाएंगे 
और तो और 
मैं ,तुम 
और वे जो आने वाले हैं 
वो भी एक न एक दिन  
मिट्टी में अवश्य मिल जाएंगे... 
वक़्त ही रहा है 
अपनी खामोश 
आवाज के साथ 
और सदा रहेगा। 
       -----           सुरेन्द्र  भसीन 

Monday, October 23, 2017

कामना

 हे,
अग्निदेव! जलदेव!
मेरे मरणोपरांत, 
मेरी हड्डी-हड्डी जला-लो, 
गला-लो पूर्णतया
चूर-चूर करके 
उसकी राख बना लो 
पुनः इस वातावरण 
में मिला लो !
     ---------             सुरेन्द्र  भसीन    

कुतर्क

तुम्हारे
ये खुदगर्ज वासनामयी तर्क
किसी काम नहीं आयेंगे
जब अंतिम समय यमदूत तुम्हें लेने आयेंगे।
तुम्हारा हिसाब-किताब, धन-दौलत
पुण्य कर्म के तुम्हारे
बटोरे हुए दिखावटी कागजी तमगों
सरकारी वाहवाहियों, प्रशस्तीपत्रों का भार भी
यहीं छूट जायेगा -नीचे
न कोई इन्हें सुनेगा, न ही
इनका तिनका भर ऊपर जा पायेगा तुम्हारे साथ।

क्योंकि वहाँ के
पाप-पुण्य की भाषा, परिभाषा
कर्म के सदमार्ग की ओर से
पूर्णतया अनभिज्ञ ही रहे जीवन भर
सत्य को भी तुमने कभी न जाना, न  पहचाना ।
अब अपने अंतिम समय
जब तुम्हें हाथ पर रखे दिए की लौ में
एक लौ हो जाना है तो,
होंगे कैसे ?
किस विश्वास के  सत्य के साथ
कह पाओगे उसे
कि मुझे अपने में समा लो !
          ---------           सुरेन्द्र भसीन
















क्रोध बम

क्रोध के भी 
अनेक घातक बम बन जाते हैं 
विरोध भरे, विद्रोह सने 
हर जीव के भीतर ही भीतर
तैयार धज्जियाँ उड़ाने को संबंधों की,
अस्तित्व तोड़ते इंसानी पहाड़ी इरादों का,
उजाड़ बनाते लोगों की भावनाओं के शहर के शहर,
वैमनस्य का प्रदूषण फैलाते हर और 
किसी को न नजर आते, न समझ आते 
जब धोखे से फटते तो 
सब तहस-नहस और तबाह कर जाते 
भीतर-बाहर 
अपने में ,अपनों में 
गहरे घाव कर जाते। 
         -------           सुरेन्द्र भसीन  

Sunday, October 22, 2017

सफ़ा पन्ने

कोई भी
इच्छा, चाह या  पुस्तक 
पूरी  नहीं होती  मेरी
सारे पन्ने सफ़ा हैं
और मैं किसी भी
लकीर से पहले
हो चुका हूँ
खत्म।
          ---------                सुरेन्द्र भसीन 

मैं एक पत्थर हूँ

मैं
एक पत्थर हूँ
बहुत बड़ा-सा
बहुतों के रास्ते में -   अड़ा-सा
जब तक
कोई ठोकर मारे
उससे पहले
मैं खुद ही हट जाता हूँ 
और गल्ती से
इंसान-सा व्यवहार
कर जाता हूँ।
 ---------        सुरेन्द्र  भसीन