Sunday, October 22, 2017

संकोच में नहाना

मैं
संकोच में नहाता हूँ
या संकोच के कारण नहाता हूँ
मगर ऊंची आवाज़ में
गाना जरूर गाता हूँ
पता नहीं बिना गाये
मैं नहा क्यों नहीं पाता हूँ या
नहाने से कतराता हूँ ?
हर बार आँखे भी मुंद जाती हैं मेरी।
क्या मैं
ईश्वर के सामने जाते शर्माता हूँ -
जैसे मेहमान के पास  जाने से
शर्माता कोई बच्चा ?
याकि हर नवीन से
मैं भय खाता हूँ।
           ----------             सुरेन्द्र भसीन  

कविता किरचें

कविताओं  के  नहीं
बिखराव  के  संकलन होते हैं
यह कविता संग्रह
छोटे-छोटे रंगीन कांच की
किरचें बटोरना
भावनाओं को बिना सार्थक वजह बीनना
महज जगह साफ़ करने के उद्देश्य से समेटना
कि अब किरचें
लहुलुहान नहीं करेंगी किसी को,
कि आश्वस्त करना सभी को,
कि हादसे
तरतीब से
निपट /गुजर गए हैं।
     ---------             सुरेन्द्र  भसीन 

गजल के टुकड़े

बेखबर  होने से  खबरदार  होना  अच्छा  है
हादसों का यह छपा अखबार बड़ा अच्छा है।
नजर  जहां तक जाती  है तिजारत ही तिजारत है
हमारे संग आपका यह व्यवहार बड़ा अच्छा है।
अखबार की सुर्खियां अब चाय से न निगली जायेंगी
इसके  लिए समझदार  होना न बड़ा अच्छा है।
मंदिर-मस्जिद की सीढ़ियां रास आ जाएं हमको
इसके लिए गुनहगार होना बड़ा अच्छा है।
दुनियादारी  का  चालो -चलन  समझने  के लिए
होशियार  होना  बड़ा  अच्छा  है।
                 -----------                        सुरेन्द्र  भसीन          

आज का रावण

इस देश के
(आत्मा)राम को
न जाने क्या हुआ कि
इसे आज का रावण
दिखता क्यों नहीं है ?
तीन सौ पैंसठ दिन
अपने दसों सिरों से हमारा उपहास करता
वे दसों दिशाओं में
बढ़ता ही जाता है
और हमारा राम है कि 
दशहरे के एक दिन का इंतजार
करता ही रह जाता है
और बहुत जल्दी ही ऊपरी/फौरी तौर
पर उसे मारकर
उसे जलाकर
अपने कर्तव्य की इतश्री कर,
मिठाई-खा, सो जाता है। 
अच्छा हो सब
अपने भीतर
(आत्मा)राम को जगाओ
उसे दिनोदिन बढ़ता
रावण दिखाओ,
उसे मारकर,
रोज दशहरा मनाओ।
        ------     सुरेन्द्र भसीन

Saturday, October 21, 2017

बेफजूल ग़ज़ल

ग़ज़ल कहकर
परेशानियाँ क्यों बढ़ाते हो
स्पष्ट कहो न क्या चाहते हो ?
मेरे रुकने को कहने से
तुम रुक तो जाओगे नहीं,
अगर चले जाने को दूँ कह
तो चले जाओगे नहीं...
तुम्हें तो
न आना है न जाना है
हमसे  बस बात करने का
चाहिए एक बहाना है.....!
         ---------                     सुरेन्द्र भसीन  

विकृतियां

क्रोध को
पीने से
या अपने ही भीतर घोटने से
विकृतियां ही पैदा होती हैं
जो गुमनाम कैंसर या
रसौली बनकर फिर फूटती हैं
एक लंबे अंतराल के बाद जानलेवा होकर
अच्छा हो
उन्हें गलाते रहो और
बातचीत करके
उन्हें बहाते रहो।
       ----------            सुरेन्द्र भसीन

लंबा चुप

लंबा चुप रहना
भी झगड़ना ही होता है....
विरोध, बोलकर चाहे न कहना
लगातार चुप रहना
व्यथा  में, असहमति में....
कहने को सदा उद्त्त रहना
मगर स्थान न पाना/ न मिलना
क्रोध की पराकाष्ठा को झेलते रहना
चिंतन में घुलते रहना
लड़ते जाना,
करते जाना,
निरंतर संघर्ष अपने में
अपने ही भीतर
एक इंतजार भरा
अपनी ही सहमति में।
           ------------            सुरेन्द्र भसीन