Monday, December 7, 2015

सामंजस्य और तालमेल

खिचड़ी और घालमेल से 
सामंजस्य और तालमेल कहीं ऊपर होता है,
लेन-देन और मोल-भाव से अलग
यह आजकल की सरकारें नहीं जानती 
इसलिए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना 
यह बिल्कुल भी वाजिब नहीं मानती। 

हार-जीत 
उनके लिये सत्ता का पहले ४०-६० था कभी
अब तो मुट्ठी भर अगड़ों-दगडों से भी नीचे उत्तर आया है और 
कौन अकेला अनपढ़ गंवार सौ पर भारी पड़ जाए 
यह राजनीति का कोई भी स्याना नहीं जानता। 

तालमेल से, सांमजस्य से 
बिना क्रोध के विरोध भी संभव है 
वरना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा याफिर 
अंधे का स्वांग करने वाले को गंतव्य तक पहुंचाने जैसा 
सब कुछ असंभव है। 
जहाँ तालमेल में, सांमजस्य में 
एक ऋदम होता है, समझ होती है  और  
एक दूसरे के विचारों का स्थान होता है  
मगर खिचड़ी में, घालमेल में तो
घमासान होता है और  
सब का बस  भारी नुकसान होता है। 

























Thursday, December 3, 2015

आज इंसान/ प्रकृति

आज इंसान 
प्रकृति के निर्णयों से 
सहमत नहीं हो पाता है,
उनके सामने सिर नहीं झुकाता है,
नतमस्तक नहीं होना चाहता है

तो प्रकृति भी 
इंसान के कृत्यों को कहाँ 
वहन-सहन कर पाती है

दोनों में दिनों-दिन
दूरियां बढ़ती ही जाती हैं। 
इसलिए इंसान अगर प्रकृति को खाता है तो  
कभी प्रकृति भी 
इंसान को लील जाती है। 

Tuesday, December 1, 2015

संत / सूरज आशा भरा

ऊपर से 
नीचे की ओर ही 
उतरता है अँधेरा सदा
और जल्दी ही काली निराशा से ढक देता है सब कुछ। 

और ऊपर से ही 
उगता है कोई सूरज आशा भरा   
जो सारी कालिमा को समेट-मेट देता है। 

यों ये, सिलसिला जारी रहता है तब तक 
जब तक कि अँधेरा
हमारे भीतर ह्रदय में नहीं पसर जाता है,
आत्मा में नहीं उतर जाता है
हमारी पहचान बन। 

तब रोशनी का सूर्य 
उसे हटा नहीं सकता हमारी आत्मा से। 
तब कोई संत ही अपने संदेशों से,
परोपकार, सय्यम, ईश्वरनाम का जब 
अभ्यास कराता है। 
तभी, और केवल तभी 
भीतर तक पैठा निराशा का अँधेरा छंट पाता है। 
और मानव उल्लास भरा नवजीवन पाता है। 









Sunday, November 15, 2015

वाह ! वाह !



कितना 
सुख, चैन, आराम  है 
नग्न हो जाने में,
प्रकृति के पास लौट जाने में,
उन्मुक्त गगन के पंक्षी हो जाने में,
बेपरवाह हो जाने में,
स्वछंद हो जाने में 
वाह ! वाह !

Sunday, November 1, 2015

साज का संदेश

बजाने को कलाकार ही नहीं 
साज भी होता है आतुर बजने को 
साज को छेड़ो अगर सजीले अहसास से 
तो सुर के पंछी 
पंखों को लगते हैँ फ़ैलाने 
दूरियों की तो बात ही क्या है -
उँगलियों के पोरों से आत्मा तक को लगते हैं पिघलाने।  

समुद्र में नाव का माझी हो या 
किसान के मन में उगता अहसास याकि 
गौरी के मन में पिया मिलन की आस 
साज ही तो हैं छेड़ो 
तो एक ही सुर में लगते हैं गाने।   

प्रार्थना

हे प्रभु !
हजारों भूलों के शूलों में 
मुझे एक फूल दो। 

मैं 
तपते रेगिस्तानों में हूँ,
पथरीली चट्टानों में हूँ। 

मेरी 
भूलों को भूलो 
और मुझे एक फूल दो। 


सच

चाहे एक 
छोटा-सा ही सच लो 
और उसे 
और किसी से नहीं 
पहले अपने से ही बोलो।

सिर्फ इतने से ही 
तुम्हारी व्यथाओं के  बड़े-बड़े पहाड़ दरकने लगते हैं। 

सदियों से रुके 
मकतूल डाले झूठ के जहाज 
सच की हवा के हल्के झोंके से ही 
सरकने लगते हैँ।