Sunday, October 18, 2015

घर

छोड़ दो  
अपनी इन व्यापारिक मजबूरियों को 
और अपने घर पर भी एक कविता लिखो। 
तुम 
घर से निकलते ही 
घर के विचारों को 
कुर्ते पर पड़ी धूल की तरह झाड़ देते हो 
और अपनी कविता बनाम तलवार 
जिस-तिस पर तान देते हो। 

कभी,
इस तलवार को अपने पर भी तानों 
और इस घर की अव्यवस्था कहीं तुम्हारी भी है 
इस सत्य को जानो। 
तुम जो यह तारकोली अँधेरा अपने घर भर में भरते जा रहे हो 
यह सोच कर तुम अपने बच्चों के लिये घर भर उजाला कमा रहे हो। 

नहीं तो सोचो
कहाँ से आया है इस घर में यह अंधेरा। 
इसे बाहर से तुम्ही तो लाये थे अपने साथ। 

और अब यही तारकोली अँधेरा,
जो तुम्हारी उँगलियों के पोरों से बच्चों में उतर गया है,
मानो पहाड़ से होता हुआ समूची घाटी में पसर गया है, 
नागफ़नियों की तरह तुम्हें और  बच्चों को ग्रस रहा है, 
इससे अब तुम 
हम-सबको बचा लो 
और जीवन के लिये नया उजाला कमा लो। 












अपना भय

भय 

हार जाता हूँ मैं 
मैं हार जाता हूँ 
अपने ही भय से।  


पिटा हूँ कई बार 
उन्ही हाथों से
जिन हाथों ने भीरु बनाया था मुझे
वैसे मेरी अपनी ही कमजोरी 
तोड़ती है मेरे मन को
मेरे तन को। 
कई बार सब छोड़-छाड़ कर भाग जाना चाहता हूँ 
मगर चाहकर भी 
यह कर नहीं पाता हूँ 
क्योंकि 
हार जाता हूँ मैं,
मैं 
हार जाता हूँ अपने ही भय से। 

प्रतिशोध

वे उसके चश्में के नहीं 
आँखों के लैंस थे 
जो तुमने फोड़ दिये 
इस घिनौनी साजिश के साथ 
कि कहीं तुम्हारी दी यातनाओं के अक्स 
उसके बच्चों में न उतर जाएँ प्रतिशोध बन। 

मगर जाओ और जा कर देखो 
कि सदियों से सुप्त पड़ा क्रांति बीज 
उसके रक्त से सिंचित हो 
एक रक्तिम गुलाब बन चुका है 
तुम्हारे वजूद को धिक्कारता। 

Saturday, October 17, 2015

अहसास


ये जो
सारी की सारी वस्तुएँ हैं न 
हमारा मन, हमारी इच्छायें पढ़-पढ़ कर 
वैसे ही करतीं हैं हमसे व्यवहार 
जैसे हमारे तन-मन की अवस्था बदलती 
जाती है बार-बार। 
जहाँ क्रोध में वो कुछ ज्यादा ही अटकती हैं तो 
खुशी में उलहसकर ज्यादा ही मटकती हैं।

ये दरवाजे, ये बर्तन, ये कपड़े, ये जूते,
ये मेज-कुर्सी, स्कूटर-कार या फिर ऑफिस का सामान 
सब का सब हम पर हॅंसता है और व्यंग्य करता लगता भी है,
वक़्त आने पर अपनी पूरी जगह मांगता और न पाने पर 
हमसे लड़ता भी है। 
चोट खाने पर बुरी तरह ऐसे चिहुँकता जैसे 
किसी ने कुत्ते की दुम पर पाँव रख दिया हो याकि 
पेड़ से नारियल तोड़ कर गिराया हो जैसे।   

कैसे-कैसे
विरोध,क्रोध,विरह,प्रेम, काम, आह बेजान वस्तुओँ में उतर आता है 
नहीं !  वस्तुओँ में 
हमारे वक़्त का प्रतिबिंब ही बस जाता है। 













Wednesday, October 14, 2015

गांधीजी के सहारे


गांधीजी ने कब कहा था ?
कि मेरा नाम नोटों पर छापो और 
मेरे नाम पर रिश्वत की चाँदी काटो या 
मेरे नाम पर देश और कौम को बाँटो। 
पर तुम्हें तो, 
ये सब कुकर्म किसी बड़े नाम की आड़ में करना ही था, जैसे  
अदालत में तुम धर्मग्रंथों की कसमें खाते हो 
और हुजूर-हुजूर करके बेशर्मी से झूठ बोलते जाते हो। 

तुम कितने गुनाह, कितने दुष्कर्म 
अपने धर्मग्रंथों की ओट में छुपाना चाहते हो 
मगर मौका मिलते ही फिर-फिर करते भी जाते हो। 

तुम चाहो या न चाहो 
ये पाप भी तुम्हारी नजायज संतान ही हैं जो 
पीछा करते एक न एक दिन 
तुम्हारे ही मुँह पर आयेंगे 
-और तुम्हारी आत्मा को कोचेंगे  
तुम्हारी ही देह चबायेंगे ।  

Friday, October 9, 2015

जरूरी बात

रामायण,महाभारत या 
सत्यवादी राजा हरीशचंद्र की कथायें पढ़ते जाने से 
उनके तजुर्बे अब कभी 
सीधे तुम्हारे जीवन में काम नहीं आते 
वे कथायें कभी चित्र थीं 
अब महज रीतता रेंखाकन मात्र रह गयीं हैं 
इसलिये दूसरों के तजुर्बों को न जमा करो 
अपने  तजुर्बे के वटवृक्ष को 
अपने ही वक़्त और रक्त से सींच कर बड़ा करो

वैसे भी गाड़ी में किसी के पीछे बैठ जाने से 
रास्ते कट तो जाते हैं 
पर याद नहीं रह पाते, अपने नहीं हो जाते।  
और जीवन में उधारी के या चुराये हुए तजुर्बे
कभी मंजिल तक नहीं पहुंचा पाते 
वक़्त आने पर तुम्हें 
प्रश्नों के चौराहे पर या जंगल बियांबन में छोड़ जाते हैं। 

रंग-बिरंगे पक्षी


जैसे 
रंग-बिरंगे पक्षी 
न जाने कहाँ-कहाँ से 
आ बैठते हैं घर की, छतों की मुंडेरों पर 
ख्याल और सपने भी 
अपने आप ही उतर जाते हैं हममें 
जीवन का हिस्सा बन जाने को। 
और मंत्रमुग्ध-सा उसके पीछे हो लेता है 
जीवन स्वर्णमृग पाने को।  
नई लिप्सा में लिपटा-चिपटा 
आत्मा को भटकाने को 
जिज्ञासा का मूल्य 
जीवन से चुकाने को।