Sunday, June 28, 2015

सोच एक गुबार


जीवन तो 
पेड़ और पहाड़ का भी बीत जाता है एक न एक दिन 
यूँ ही एक जगह पर अड़े-खड़े 
क्योंकि जड़त्व में जीवन नहीं होता 
और वक्त किसी को भी 
सकते में नहीं रखता कभी। 

हो सकता है या नहीं,
चलना है या नहीं,
कहना है या नहीं,
मानू या न मानू .... 
सारे संशय, सारे उहापोह 
तो भीतर ही होते हैं इंसान के,
उसे जकड़ते-खेंचते हैं -
उसके घमंड के उपरले-अंतिम सिरे तक 
जहाँ तक कि 
सोच के, भावना के गुबार को
वह वहन करे, सहन करे -
फटने-फटने की  मनस्थिति तक … 
सोच-सोच कर अपना सिर पीटने तक   या 
फिर पागल हो जाने तक।  




प्रायष्चित



तुमने 
तनिक थमकर,
रुककर या ठहरक
अपने में, अपने आपको कभी देखा है?
रुककर नहीं तो जीवन के प्रवाह में बहते हुए,
काम करते हुए,व्यवहार करते हुए 
तो बिल्कुल भी नहीं देखा होगा?
कभी देखा भी होगा तो 
भीतर इतना अंधेरा था कि 
कुछ दिखायी नहीं दिया, हैं न!
और भीतर के अंधेरे 
तुम्हें बहुत डराते भी हैं,
तुम्हारे पापों की अस्थियों से 
तुम्हारा सामना भी कराते हैं। 
इसलिए तुमने जीवन में रुकना और 
अपने अंदर जाने का प्रयास ही छोड़ दिया और 
तुम बाहर-बाहर भागने लगे 
अपने से छिप-छिप कर या फिर 
तुम्हारे बाहर बहुत उजाला है और अंदर-भीतर  घना अँधेरा
जिसे तुम्हें हटाना ही नहीं आता। 
मगर कुछ पल भी 
तुम ऐसा कर लेते तो 
अपने आपको, आ चुकी व आने वाली 
अनेक मुश्किलों से बचा सकते थे,
और रुककर थमकर अँधेरे का सामना करके 
तुम अपनी कालिमा पर विजय पा सकते थे। 

चाहो तो अब भी 
अपने पापों की अस्थियों को प्रायष्चित की 
गंगा में बहा सकते हो और 
अपने भीतर साधना का उजाला ला सकते हो। 



















Wednesday, June 24, 2015

पेड़ की पेंटिग



पहले जब 
पेड़ के पास जाओ 
तो उसके पास  बैठो, 
उससे हाथ मिलाओ, 
और हो सके तो उसके गले लग जाओ 
अपने में उसे खड़ा करो,
टहनी-टहनी बड़ा करो, पत्ते-पत्ते लहराओ .. 
फिर उससे अच्छे से बतियायो 
जैसे मिले हो अरसे बाद अपने बिछुड़े से 
उसे भी अपनी इंसानियत का अहसास कराओ।  
फिर स्नेह-रंग से कैनवास पर उसकी तस्वीर बनाओ और
उसमें अपने जीवन-प्राण दबाओ। 
ऐसे नहीं कि 
निकाले रंग-कूची और शुरू हो गये 
ऐसे तो दीवारें व छतें रंगी जातीं हैं हड़बड़ी में, 
कैनवस पर तो 
पेड़ ऐसे बनाते हैं, जैसे उगाये हों धरती पर कि 
चिड़िया आकर बैठ जाये कि 
बादल थमकर बरस जायें कि  
खुद पेड़ धोखा खा जाये 
और बहार आने पर कैनवास का पेड़ भी बोर्रा जाये। 








क्रोध



बहुत ऊँचे से 
एक भारी पहाड़ी पत्थर की तरह गर्जन करता 
गिरता है क्रोध छपाक से.....  
शांत,कल-कल 
बहती जीवन धारा में 
और सब कुछ दहलाकर,
मोड़ देता है उसे गंत्वय से 
और कभी,अवरूद्ध तक कर देता है समूचे जीवन प्रवाह को।   

आँखों में आग,
नसों में उफनता लावा-तनाव,
उत्तेजना की परकाष्ठा में होश खोना 
और फिर 
सदियों से संजोया प्यार-विश्वास, तहस-नहस 
हो बिखर जाता है एक झटके में 
यूँ जैसे बड़े बवंडर के आने के बाद 
छत उड़ जाती है सबके सिरों से......  

अपनों का अलगाव हो या चाहे सामान का बिखराव 
सालों-साल में आयेगा अब इनमें सुधार, 
जब वक्त की शीतल जल धारायें 
इस पत्थर को
रेत करेंगी और बहा ले जायेंगी 
अपने साथ।  






















Tuesday, June 23, 2015

ईश्वर की खोज



एक संतुलन,एक संगीत,
एक रिध्म, एक तारतम्य 
बहता रहता है इस समूचे ब्रमांड की शिराओं में 
जो अनेकानेक 
अव्यवस्थाओं को बड़ी खूबसूरती और कुशलता से संभालकर 
ऐसी व्यवस्था में ढालता है कि 
सैंकड़ों तारपुंजों के हजारों सूर्यों में,
पल-पल अरबों-खरबों होते परमाणु विस्फोटों में
चक्राती धरती के वजूद को एक-एक अक्षांश,
मौसम के मिजाज को एक-एक डिग्री भी,
इस कदर संभलता है कि 
उसपर जीवित एक-एक कीड़ी का भी जीवन पूरा चले 
ऐसी व्यवस्था निकालता है। 

यहाँ आकर 
असंख्य अगर-मगर, किन्तु-परन्तु भी 
सीधे आकार में लगकर तर्क बन जाते हैं,
और कितने ही अनजाने भय 
अपना आयाम खोकर गर्त में विलीन हो जाते हैं,
तो यह प्रकृति का ईश्वरीय रुप नहीं तो और क्या है ?

रोज हम इस सत्य को 
अपने अंतर्मन में उतारते हैं और 
पूछते भी जाते हैं कि
ईश्वर है कि नहीं ?  और  इसे  हम  कैसे  देख  सकते  हैं?    













Monday, June 22, 2015

मनोकामना



जब से 
मैंने जाना है 
ईश्वर कहीं मेरे भीतर है 
मैं अपने भीतर ही हो जाना चाहता हूँ,
बाहर से नेत्र फेरकर।

भीतर ही कहीं 
शहर,गाँव,सड़कें,मकान बना लेना चाहता हूँ,
भीतर ही अपने 
माँ,बाप,पत्नि,बच्चे व बंधु-बांधव बसाना चाहता हूँ,
और तो और 
अपने मौसम और त्यौहार भी वहीं मनाना चाहता हूँ। 

इन्द्रियों की मोह-माया,विषय-वासना,प्यास-पिपासा की 
सारी सीमाओं-वर्जनाओं को तोड़कर, 
आखेटक से निर्भय पंख फैलाकर - मुक्त 
अपने भीतर ही ईश्वर की खोज में यात्रा पर निकल जाना चाहता हूँ। 
ये यात्रा, 
बनावट और बसावट भीतर हो 
पहले संभव न था, मगर 
जब से 
यह जाना है और अंतर्मन से माना है मैंने कि 
ईश्वर कहीं मेरे भीतर ही है 
मैं अपने भीतर ही हो जाना चाहता हूँ 
बाहर का सब छोड़-छाड़कर।                















Friday, June 19, 2015

सच की इबारत



नहीं... नहीं 
सच यूँ नहीं लेगा आकार कि 
एक झटके से 
समुद्र ले ले विशाल ऊँचे पहाड़ का आकार 
और उसकी चोटियों पर 
सीपियाँ चुनते तुम्हें लगे कि 
यही मेरे झूठ भरे, ठांठें मारते समुद्र की 
मुठ्ठी भर अस्थियाँ हैं  

नहीं 
सच यूँ भी नहीं लेता आकार कि 
वह आये दबे पांव, चुपके से, चोरी से 
और तुम्हारे बगलगीर होकर चलने लगे
खामोश, बेअहसास।

वह तो जब भी आयेगा 
सबको बता कर, आँखों में आँखें डालकर 
हो जायेगा - मेरे,तुम्हारे, उसके 
मन पर सवार,और
सारे  भय व संशय मिटाकर 
विश्वास का अध्याय लिखेगा आत्मा पर 
सदा-सदा के लिये