Thursday, May 21, 2015

सामाजिकता



सामाजिकता  के 
आवरण के नीचे 
बड़ी मजबूरियों से सभ्य हुये हम 
मूलतः तो एक पशु ही हैं। 
जो हर पल छटपटाता है और 
इस केंचुली के हटते ही 
बड़ा सुख व सकून पाता है।  

कभी सोचा 
कि ये जंगल ,ये पहाड़ ,ये झरने 
हमे इतना क्यों भाते हैं और 
कैसे -कैसे उनके गुप्त व मौन ईशारों को पाकर 
हम क्यों उनकी और खिंचे चले जाते हैं। 
और क्यों हमारे न चाहते हुए भी,
और  हमारे इन्हें गगनचुम्बी इमारतों के पीछे 
छुपाने के बावजूद भी 
ये  हर रोज हमारे भीतर उभर -घुमड़ आते हैं। 
सामाजिकता की नकली जहरीली सांस 
अपने फेफड़ों में भरते हम 
बार- बार ये क्योँ भूल जाते हैं कि 
बड़ी मजबूरियों से सभ्य हुये हम 
मूलतः तो पशु ही हैं।  








Wednesday, May 20, 2015

माँ की याद में



ओ मेरी माँ 
मुझे बचपने में ही 
इस भीड़ भरे शहर में 
अकेले बेसहारा क्यों छोड़ गई थी ,
जैसे कोई शेरनी छोड़ देती है
शावक को घनघोर बियाबान जंगल में। 
एक लम्बे समय तक, 
इन सड़कों की जगमगाती नियोन लाइटों की शहतीरें 
और दानव की तरह इधर- उधर भागती गाड्यिों की 
रोशनियों की आंख्नो में चुभते किरचें 
दोनों ही मुझे बहुत सताती रहीं 
और  इस भरे पूरे शहर में भी 
मुझे अकेला होने का अहसास कराती रहीं। 
तब मेरा विश्वास भी निरा मेरा वहम निकला कि 
वक़्त व ऊम्र के बीतते - गुजरते मै इस भय से 
अवशय छुटकारा पा लूंगा। 
मगर यह  हो न सका कयोंकि ये तो मेरे जिस्म की चमड़ी से चस्पां हो  चुकी है। 
और अब तो उम्ह्र के इस पड़ाव में कोई शक नहीं रहा अशेष कि मुझे तो इनके साथ ही जीते जाना होगा। 
मगर मैं अपने बच्चोँ को 
उनकी माँ के आंचल में पालकर 
उनको इस दर्दीले अहसास से बचाना चाहते हूँ 
और उनका परिचय (पालन )
एक निर्भय उजले सूर्य  से करवाना चाहता हूँ। 















खरी- खरी




अपने
मरते ही
तुम एक पेड़ अपने  साथ जलाते हो
भला जन्मते ही क्या तुम एक पेड़
अपने साथ लाते हो या
इस धरती पर पॉँव रखते ही उसे उगाते हो !

भाई , ऐसा ही चलता रहा
तो ये पेड़ हमारे कितने दिन चल पायेँगे
मरने पर तो छोड़ो
जिंदा रहते भी तुम्हें  ये
सांस के लिये हवा नहीं दे पायेँगे।

मेरी मानो
पेड़ों के कम होने की हालत पर
ज़रा दृष्टि डालो
और मरने और पैदा होने के
रिवाजों में पेड़ उगाने की रिवायत डालो।              



महशून्य



कल 
में से निकलता है आज 
आज में से निकलेगा  - कल । 
यूँ हीं 
उतरती प्याज़ की परतें 
                उतरती परतें ... 
और फिर एक दिन बचता है 
           शून्य .. महशून्य …  ।    

Thursday, May 14, 2015

एक सत्य यह भी



मृत्यु में प्राणी 
गहरी काली नींद के उस पार ही 
निकल जाता है अपने चेतन व अवचेतन को 
छोड़कर कभी न लौटने के लिये। 

काले स्याह पर्दे के पीछे याकि 
महाप्रकाश पुंज में समाता ही चला जाता है याकि 
कहीं चला जाता है इस देह को छोड़कर। 

वैसे वह हमारे बीच ही होता है 
एक नई पहचान लेकर 
फूल,पेड़,जानवर,इंसान या कुछ भी 
या जिसे हम चाहें भी या न चाहें 
मगर होता यहीं है वह लगातार 
हमारे भीतर बाहर 
हमारे वायदों को घूरता 
हमे देखता 
हमारी आंख्नो के सामने 
अपहचाना।              


नींद एक जीवन/ मृत्यु



नींद 
भी  तो 
एक तरह से मृत्यु का ही एक  लघु रूप होता है। 
जो  हमें निचेश्ट कर प्रारूपित करता है कुछ पलों के लिए 
नीचे - गहरे नींद की आगोश में 
और हम 
एक नया लोक आलोक कर लेते  हैँ 
अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए। 
तब हम यहाँ के संस्मरणों के स्मरण के इलावा 
सब कुछ खो चुके होते हैं। 

और 
नींद पूरी होने पर 
बिस्तरयान पर पड़े हमे यह अहसास 
भी नहीं होता कि हम एक 
छोटी मृत्यु को जी भी चुके हैं।                     




Monday, May 11, 2015

नींद एक जीवन/ मृत्यु



नींद 
भी  तो 
एक तरह से मृत्यु का ही एक  लघु रूप होता है। 
जो  हमें निचेश्ट कर प्रारूपित करता है कुछ पलों के लिए 
नीचे - गहरे नींद की आगोश में 
और हम 
एक नया लोक आलोक कर लेते  हैँ 
अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए। 
तब हम यहाँ के संस्मरणों के स्मरण के इलावा 
सब कुछ खो चुके होते हैं। 

और 
नींद पूरी होने पर 
बिस्तरयान पर पड़े हमे यह अहसास 
भी नहीं होता कि हम एक 
छोटी मृत्यु को जी भी चुके हैं।